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Udhampur News: भद्रवाह में तीन दिवसीय मेला पट्ट का समापन
Sun, 31 Aug 2025 02:05 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, उधमपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, उधमपुर
Updated Sun, 31 Aug 2025 02:05 AM IST
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भद्रवाह। भद्रवाह में मेला पट्ट के अंतिम दिन पारंपरिक डक्कू नृत्य प्रस्तुत करते श्रद्धालु: आयोजक
भद्रवाह। जम्मू-कश्मीर के भद्रवाह के मोहल्ला खाखल में तीन दिवसीय ऐतिहासिक मेला पट्ट का शनिवार को समापन हो गया।
इस उत्सव के अंतिम दिन हजारों लोग समृद्ध प्राचीन नाग संस्कृति और सदियों पुराने सांप्रदायिक सद्भाव को दर्शाने वाले इस वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद लेने के लिए एकत्रित हुए।
सांप्रदायिक सद्भाव और प्राचीन नाग संस्कृति का प्रतीक यह मेला 16वीं शताब्दी में दिल्ली में सम्राट अकबर और भद्रवाह के राजा नागपाल के बीच हुई ऐतिहासिक मुलाकात की याद में हर साल मनाया जाता है। भद्रवाह घाटी के आराध्य देवता भगवान वासुकी नाग को समर्पित यह मेला हर साल नाग पंचमी से मनाया जाता है। कैलाश यात्रा के समापन पर यह मेला आयोजित किया गया था और जाति, रंग और धर्म से ऊपर उठकर सभी लोगों ने इसमें भाग लिया और मेले के साक्षी बने।
गौरतलब है कि इस मेले की शुरुआत राजा नागपाल ने 16वीं शताब्दी में तत्कालीन भद्रकाशी नामक छोटी रियासत के शासक के रूप में की थी, जिसे अब भद्रवाह के नाम से जाना जाता है। नाग भक्तों ने प्राचीन नाग संस्कृति के प्रतीक इस अनोखे सांस्कृतिक आयोजन को धरोहर का दर्जा देने और वार्षिक पर्यटन मानचित्र में शामिल करने की मांग की है।
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इस उत्सव के अंतिम दिन हजारों लोग समृद्ध प्राचीन नाग संस्कृति और सदियों पुराने सांप्रदायिक सद्भाव को दर्शाने वाले इस वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद लेने के लिए एकत्रित हुए।
सांप्रदायिक सद्भाव और प्राचीन नाग संस्कृति का प्रतीक यह मेला 16वीं शताब्दी में दिल्ली में सम्राट अकबर और भद्रवाह के राजा नागपाल के बीच हुई ऐतिहासिक मुलाकात की याद में हर साल मनाया जाता है। भद्रवाह घाटी के आराध्य देवता भगवान वासुकी नाग को समर्पित यह मेला हर साल नाग पंचमी से मनाया जाता है। कैलाश यात्रा के समापन पर यह मेला आयोजित किया गया था और जाति, रंग और धर्म से ऊपर उठकर सभी लोगों ने इसमें भाग लिया और मेले के साक्षी बने।
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गौरतलब है कि इस मेले की शुरुआत राजा नागपाल ने 16वीं शताब्दी में तत्कालीन भद्रकाशी नामक छोटी रियासत के शासक के रूप में की थी, जिसे अब भद्रवाह के नाम से जाना जाता है। नाग भक्तों ने प्राचीन नाग संस्कृति के प्रतीक इस अनोखे सांस्कृतिक आयोजन को धरोहर का दर्जा देने और वार्षिक पर्यटन मानचित्र में शामिल करने की मांग की है।
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