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बंदरों के आतंक से 200 परिवारों ने छोड़ा गांव

Sun, 19 Jun 2016 12:37 AM IST
अमन शर्मा, उधमपुर
अमन शर्मा, उधमपुर Updated Sun, 19 Jun 2016 12:37 AM IST
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200 families left the village from the terror of monkeys
प्रदेश सरकार के आग्रह पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने यह अधिसूचना जारी की है।

जिले के चड़ई गांव में बंदरों के आतंक के कारण करीब दो सौ परिवार गांव छोड़ चुके हैं। फसल बर्बाद करने के साथ ही उनके  हिंसक व्यवहार ने भी लोगों का घरों से निकलना मुश्किल कर दिया था। अब गांव में करीब 50 परिवार ही बचे हैं। ये वे लोग हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है।

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यही हाल धनू व चन्नास गांव के भी हैं। इन गांवों से भी अभी तक कई परिवार पलायन कर उधमपुर आ गए हैं। ग्रामीण कई बार जिला प्रशासन से बंदरों से बचाने की गुहार लगा चुके हैं। चड़ई निवासी पुष्पा देवी (70) ने बताया कि जब वह ब्याह कर इस गांव में आई थीं, तब गांव में करीब 250 परिवार रहते थे।
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पर पिछले कुछ साल में बंदरों के आतंक ने 200 से अधिक परिवारों को दरबदर कर दिया। जो लोग अभी गांव में रह रहे हैं, वे आर्थिक रूप से कमजोर होने की वजह से गांव नहीं छोड़ पा रहे हैं। राजेश व राम पुरुषोत्तम ने बताया कि अच्छी खेती के आधार पर पहले चड़ई एक समृद्ध गांव था, पर बंदरों ने फसलों को बर्बाद कर दिया।
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हिमाचल के वन विभाग से चल रही है बात : चौधरी
इस समस्या के बारे में मुख्यमंत्री के अतिरिक्त सचिव शाहिद इकबाल चौधरी ने कहा कि उन्हें लोगों के गांव छोड़ने की जानकारी नहीं है। हालांकि चड़ई और अन्य गांवों में बंदरों के आतंक से वह अवगत हैं। इसको लेकर हिमाचल प्रदेश वन विभाग से बात चल रही है। उनके पास बंदरों के आतंक से निपटने के लिए कार्यक्रम है। इसके बारे में वन मंत्री से बात कर योजना बनाई जा रही है। कुछ ही माह में लोगों को बंदरों के आतंक से निजात मिल जाएगी।

हिमाचल के पास नहीं है कोई कारगर तरीका
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने हिमाचल प्रदेश में बंदरों को मारने की अनुमति राज्य सरकार को दी थी। इसी तरह बिहार में नील गायों को भी मारने की अनुमति दी गई थी, लेकिन यह मामला अब सुप्रीमकोर्ट में चला गया है। इस तरह देखा जाए तो केंद्र के इस फैसले से यह बात साबित होती है कि हिमाचल प्रदेश के पास भी बंदरों के आतंक से निपटने का कोई कारगर तरीका नहीं है।


बंदरों के आतंक से गांव में हर कोई परेशान है। 200 परिवार बंदरों के कारण गांव छोड़ने पर मजबूर हो गए।     अब खेती तक नहीं हो पा रही है। इसके बारे में प्रशासन के कई  आला अधिकारियों और मंत्रियों से बात की गई, लेकिन हर किसी ने बंदरों की समस्या को गंभीरता से नहीं लिया, इसीलिए अब तक कार्रवाई नहीं हो पाई है।
मक्‍खन लाल, सरपंच, चड़ई

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