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जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को चुनौती मुद्दे पर फैसला सुरक्षित

Thu, 17 Mar 2016 10:08 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/नई दिल्ली
ब्यूरो, अमर उजाला/नई दिल्ली Updated Thu, 17 Mar 2016 10:08 AM IST
सार

  • हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को अब लिखित पक्ष रखने का दिया निर्देश
  • मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी व न्यायमूर्ति जयंत नाथ की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई
  • जनहित याचिका कुमारी विजय लक्ष्मी झा ने दायर की है
  • सभी तथ्यों को देखने के बाद अपना फैसला देगी अदालत

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the decision on Article 370 in Jammu and Kashmir safe
कोर्ट - फोटो : demo photo

विस्तार

हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिले विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने व वहां के अलग संविधान को चुनौती मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी व न्यायमूर्ति जयंत नाथ की खंडपीठ ने इस मामले में याचिकाकर्ता के साथ ही केंद्र व जम्मू-कश्मीर सरकार को अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।

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अदालत ने कहा कि वे सभी तथ्यों को देखने के बाद अपना फैसला देंगे। खंडपीठ के समक्ष हुई संक्षिप्त सुनवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि इस मुद्दे को लेकर पहले सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी और अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था।
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उन्होंने कहा कि याची ने जनहित में नहीं बल्कि राजनीति से प्रेरित होकर यह याचिका दायर की है। याची कुमारी विजय लक्ष्मी झा की और से पेश अधिवक्ता ने कहा कि इस याचिका में उठाया गया मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका से अलग है। उन्होंने कहा कि उनके द्वारा उठाए गए मुद्दे पर अभी विचार तक नहीं हुआ है।

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क्या है याचिका?

the decision on Article 370 in Jammu and Kashmir safe
कोर्ट - फोटो : file photo

यह जनहित याचिका कुमारी विजय लक्ष्मी झा ने दायर की है। याची के अधिवक्ता अनिल कुमार झा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए अनुच्छेद 370 के तहत अस्थायी प्रावधान किया गया था।

इसका उद्देश्य वहां विधानसभा के गठन तक था। वर्ष 1957 में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा का गठन हो गया तो अनुच्छेद 370 के तहत किया गया प्रावधान स्वयं ही खत्म हो गया है। बावजूद इसके 65 साल बाद भी अनुच्छेद 370 का प्रावधान जारी है। इसी प्रकार 17 नवंबर 1956 व 26 जनवरी 1957 में जम्मू-कश्मीर के लिए अलग संविधान बना दिया गया। राष्ट्रपति व संसद ने इसे मंजूरी प्रदान नहीं की है।

ऐसे में अलग संविधान की कोई वैधता नहीं है। याची ने कहा कि वे 26 अक्तूबर 1947 को भारत और वहां के राजा हरि सिंह के बीच हुए समझौते को चुनौती नहीं दे रहे। जम्मू-कश्मीर का संविधान भारत के संविधान के आने के बाद अस्तित्व में आया है। ऐसे में उसकी कानूनी वैधता नहीं है। वहीं, समझौते में भी यह तय नहीं था कि अलग संविधान या विशेष दर्जा रहेगा।

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