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Srinagar: पुलवामा में दहशत नहीं... अब उम्मीदों के साथ होती है हर सुबह, बर्बर हमले के सात साल बाद बदली फिजा

Sat, 14 Feb 2026 06:18 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 14 Feb 2026 06:18 AM IST
सार

हमारे सुरक्षा बलों के संकल्प, शौर्य, मुस्तैदी और सामरिक रणनीति की बदौलत पुलवामा की फिजा बदली है। 

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Srinagar: No more terror in Pulwama... Every morning now dawns with hope
पुलवामा में लहलहाते धान के खेत। संवाद

विस्तार

14 फरवरी 2019...। धमाका...। 40 सीआरपीएफ के जवान बलिदान हो गए। सारा देश गम और गुस्से से उबल पड़ा। पुलवामा में गम-गुस्से के साथ ही खौफ का साया भी था। पर...? हमारे सुरक्षा बलों के संकल्प, शौर्य, मुस्तैदी और सामरिक रणनीति की बदौलत पुलवामा की फिजा बदली है। 

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अब यहां हर सुबह हर दिन उम्मीद की नई कहानी लिखी जा रही है। स्कूल-काॅलेज जाते बच्चे हों या सुकून से दुकानदारी करते कारोबारी...बदलाव की कहानी हर तरफ नजर आने लगी है। पुलवामा हमले का गवाह राष्ट्रीय राजमार्ग-44 का वो हिस्सा भी बदल गया है। यहां फार्म हाउस और कारखाने लग गए हैं। इनमें दूसरे प्रदेशों के भी उद्यमी हैं। उद्यमियों के आंखों की चमक बता देती है कि कश्मीर का आनंद और केसर वैली के रूप में विख्यात इस शहर के लोग अब घुट-घुट कर नहीं खुली हवा में सांस ले रहे हैं।
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हम सदमे में थे...अब सब ठीक है
जहां हमला हुआ था, उसी के पास जाविद अहमद की ड्राई फ्रूट की दुकान है। जाविद कहते हैं जो जवान बलिदान हुए वे हमारे भाई थे। हमले के बाद हम सदमे में थे। पर्यटक कश्मीर नहीं आ रहे थे। बीते तीन-चार वर्षों से हालात बदले हैं। घाटी में पर्यटकों के बढ़ने से हमारा व्यवसाय भी पटरी पर आ गया है। हम सेना, सीआरपीएफ के जवानों के आभारी हैं जो दिन-रात हमारे राजमार्गों की रखवाली कर रहे हैं।
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हमने जलता हुआ कश्मीर देखा...नई पीढ़ी को विरासत में देंगे तरक्की और खुशहाली
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर के रहने वाले शब्बीर अहमद कहते हैं कि हमने तो वो दौर भी देखा है जब कश्मीर में आग लगी होती थी। हमारा इस प्रदेश और इस शहर से गहरा ताल्लुक है। हमारा परिवार यहां भी रहता है। एक वक्त था जब हम अपने घर के सभी नौ बच्चों को यहां से बाहर ले गए। उनके सुरक्षित भविष्य के लिए हमें यह कदम उठाना पड़ा। आखिर वक्त ने करवट ली। हमने महसूस किया कि बारूद की गंध मिट चुकी है और केसर की सुगंध फिर से आने लगी है। हमने यहां पर फार्म हाउस डवलप किए, फैक्टरी लगाई ताकि नई पीढ़ी को विरासत में तरक्की और खुशहाली मिल सके। यह बदलते हुए जम्मू-कश्मीर, बदलते हुए पुलवामा की कहानी है।

रिश्तेदारों से सुना हालात बदल गए...यूएई से अपने वतन लौट आया
पुलवामा के लस्सीपोरा में कोल्ड स्टोरेज यूनिट चलाने वाले रईस अहमद कहते हैं कि 2021 तक आतंकवाद और हिंसा जैसे हालात की वजह से यूनाइटेड अरब अमीरात में था। अनुच्छेद 370 निरस्त होने के बाद मेरे रिश्तेदारों ने बताया कि हालात बदल गए हैं। अब शटडाउन या हड़ताल नहीं हो रही। मैंने कश्मीर लौटने का फैसला किया और यहां आकर कोल्ड स्टोरेज यूनिट लगाई है। अभी मैं 40 से ज्यादा परिवारों को नौकरी दे रहा हूं। मैं शान से कह सकता हूं कि हमारा पुलवामा और हमारा कश्मीर बदल रहा है।

वो दौर याद है जब एक दूसरे से संपर्क भी नहीं कर पाते थे
स्वतंत्र फोटोग्राफर के तौर पर काम कर रहे सैयद आदिल कहते हैं कि मैंने व्यक्तिगत रूप से कई चुनौतियों का सामना किया है। अगर कहीं भी हिंसा की कोई घटना होती थी तो पहली चीज इंटरनेट रुकावट और संचार टूट जाता था। हमें संपर्क के लिए माइनस तापमान में भी जोखिम उठाकर घर से निकलना पड़ता था। अब चीजें आसान हुई हैं। हालात बदलने के बाद अब संपर्क नहीं कटता है। जरूरी सेवाएं बाधित नहीं होती हैं। यही तो बदलाव की कहानी है।


मुख्यधारा से जुड़ने लगे हैं छात्र, हिचक टूट रही है
पुलवामा में बदलाव के सवाल पर अकील अहमद तांत्रे कहते हैं कि 14 फरवरी को हम मेधावी विद्यार्थियों के साथ एक कार्यक्रम का आयोजन कर रहे हैं। एक वक्त ऐसा भी था कि कोई छात्र या युवा आगे नहीं आता था। वे मुख्यधारा से दूर भाग रहे थे। आज की तारीख की बात करें तो अब तक हम 17 कार्यक्रमों का आयोजन कर चुके हैं, जिसमें बड़ी संख्या में विद्यार्थी हिस्सा ले रहे हैं। किताबें उन्हें पसंद आ रही हैं। वे कॅरिअर को लेकर संजीदा हैं। मैं खुद पुलवामा पर रिसर्च कर रहा हूं और जो नतीजे आ रहे हैं, वो बदलाव की कहानी कह रही हैं।

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