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महबूबा के लिए कुनबे को एकजुट करना चुनौती

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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती की 14 महीने की नजरबंदी से रिहाई के बाद अब आगे की राह काफी चुनौती भरी हो सकती है, क्योंकि उनके पिता के देहांत के बाद से पार्टी से दूरी बनाने वालों की फेहरिस्त काफी लंबी हो चुकी है, इसलिए कुनबे को संभालने की जिम्मेदारी अब महबूबा के कंधे पर है। इतना ही नहीं पीडीपी-भाजपा गठबंधन के बाद से लोगों में पीडीपी के खिलाफ पैदा हुए आक्रोश को भी दूर करने की जरूरत है। हालांकि महबूबा भी इस पहलू को समझती हैं इसीलिए उन्होंने रिहा होने के तुरंत बाद अपने संदेश में इसकी झलक दिखला दी थी।
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महबूबा मुफ्ती ने रिहाई के बाद जारी किए गए ऑडियो संदेश में स्पष्ट कर दिया कि वह अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए आखिरी दम तक लड़ाई लड़ेंगी। महबूबा मुफ्ती ने रिहाई के बाद जारी किए गए संदेश में कहा, पांच अगस्त के काले दिन का काला फैसला हर पल मेरे दिल और रूह पर वार करता रहा। यही हाल प्रदेश के तमाम लोगों का रहा होगा। कोई भी शख्स उस दिन की डाकाजनी और बेइज्जती को कतई भूल नहीं सकता। सभी को इरादा करना होगा कि दिल्ली दरबार ने पांच अगस्त को गैर कानूनी तरीके से जो हमसे छीना, उसे वापस लेना होगा।
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इतना ही नहीं इस बार महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर मसले के समाधान की बात भी खुले आम कर डाली। उन्होंने कहा, कश्मीर मसले के लिए हजारों लोगों ने अपनी जानें न्यौछावर कीं, उसको हल करने के लिए जद्दोजहद जारी रखनी होगी। उनकी बातों से यह भी साफ हो रहा है कि गुपकार घोषणा में वह डॉ. फारूक अब्दुल्ला के साथ इस पूरी लड़ाई की अगुवाई करेंगी, क्योंकि यह उनके पास आखिरी मौका है लोगों का भरोसा जीतने का जोकि वह तब खो चुके थे जब मुफ्ती मोहम्द सईद ने भाजपा के साथ गठबंधन कर जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाई थी।
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भाई को बड़ा पद देने से खफा दिग्गजों ने बनाई दूरी
पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के 7 जनवरी 2016 को देहांत के बाद से पार्टी से कई दिग्गज दूरी बनाने लगे थे। इनमें महबूबा के भाई तसदुक मुफ्ती भी थे जो पिता की बरसी पर पार्टी में शामिल हुए। उसके बाद 22 दिसंबर 2017 को उन्हे विधान परिषद का सदस्य चुना गया ताकि 22 अक्तूबर को पीडीपी की मूल सदस्यता से इस्तीफा देने वाले विक्रमादित्य सिंह के इस्तीफे से खाली हुई सीट को भरा जा सके, लेकिन उसी दिन महबूबा के मौसा ने उन्हे अपना इस्तीफा सौंपा। वह तत्कालीन सरकार में हज और औकाफ के मंत्री थे। महबूबा द्वारा अपने भाई को इतना बड़ा पद दिए जाने के बाद से पार्टी के नेताओं में गुस्सा देखने को मिला। भले ही जम्मू-कश्मीर में गठबंधन के टूटने के बाद तसदुक मुंबई लौट गए, लेकिन पार्टी के बीच खलबली जारी रही। जुलाई 2018 को महबूबा मुफ्ती के मामा सरताज मदनी ने पार्टी के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे डाला। इतना ही नहीं पीडीपी के कई विधायकों ने भी पार्टी से दूरी बना ली, जिसमें रफी मीर, बशारत बुखारी, दिलावर मीर, यावर मीर, इमरान अंसारी, आबिद अंसारी, अलताफ बुखारी, अशरफ मीर, जावेद मुस्तफा मीर, मोहम्मद अब्बास वानी आदि शामिल हैं। इस सबके के बाद अब देखना यह होगा कि महबूबा किस तरह से पार्टी में एकजुटता कायम रखने में सफल रह पाएंगी।
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