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जम्मू-कश्मीर: धार्मिक संदेश पर विवाद के बीच एमएमयू की पहल, कश्मीर से लद्दाख तक मस्जिदों में गूंजा पैगाम
Fri, 16 Oct 2026 09:40 PM IST
Rahul Kumar Tiwari
अमर उजाला ब्यूरो, श्रीनगर
अमर उजाला ब्यूरो, श्रीनगर
Published by: Rahul Kumar Tiwari
Updated Fri, 16 Oct 2026 09:40 PM IST
सार
जम्मू-कश्मीर में खुतबे को लेकर विवाद के बीच एमएमयू ने कश्मीर से लद्दाख तक साझा धार्मिक संदेश की पहल की। मस्जिदों और इमामबाड़ों में ईमान विषय पर उपदेश दिए गए। इसमें धार्मिक एकता, नैतिक आचरण और सामाजिक जिम्मेदारियों पर जोर दिया गया।
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धार्मिक उपदेश पर विवाद के बीच एमएमयू की पहल
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जम्मू-कश्मीर में मस्जिदों के खुतबे को लेकर छिड़ी बहस के बीच मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा (एमएमयू) ने शुक्रवार को कश्मीर से लद्दाख तक साझा धार्मिक संदेश (खुतबा) की पहल की। इसके तहत कश्मीर घाटी, जम्मू संभाग, चिनाब घाटी, कारगिल और लेह की संबंधित मस्जिदों व इमामबाड़ों में ईमान यानी आस्था और विश्वास के विषय पर खुतबा दिया गया। 15 सितंबर को श्रीनगर में हुई एमएमयू की उलेमा कॉन्फ्रेंस में बनी सहमति के तहत शुरू किए गए इस अभियान में धार्मिक एकता, नैतिक आचरण और सामाजिक जिम्मेदारियों पर जोर दिया गया।
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यह पहल ऐसे समय हुई है जब जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की ओर से मस्जिदों में शुक्रवार के खुतबे के लिए साझा विषय तय करने के प्रस्ताव पर राजनीतिक और धार्मिक विवाद खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती और मीरवाइज उमर फारूक ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई थी। इसी बहाने सभी ने भाजपा को निशाने पर लेते हुए इसे मस्जिदों को नियंत्रित करने की शुरुआत बता आंदोलन की चेतावनी दी थी। विवाद के बाद वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष दरख्शां अंद्राबी ने स्पष्ट किया कि एकसमान खुतबे को अनिवार्य बनाने का कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। इसे खुद उलेमा ही तय करेंगे। यह उनके विवेक पर निर्भर है।
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प्रशासनिक दखल पर सवाल, उलेमा की सहमति से साझा खुतबा
खुतबे के विवाद के केंद्र में यह सवाल रहा कि धार्मिक उपदेशों के विषय तय करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए। एमएमयू ने वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि मिंबर (मस्जिद में खुतबा देने का मंच) से दिए जाने वाले धार्मिक मार्गदर्शन का निर्धारण उलेमा और इमामों का विषय है, किसी प्रशासनिक संस्था का नहीं। इसके विपरीत एमएमयू की मौजूदा पहल 15 सितंबर को आयोजित उलेमा कॉन्फ्रेंस में विभिन्न धार्मिक विद्वानों के बीच बनी सहमति पर आधारित है।
खुतबे के विवाद के केंद्र में यह सवाल रहा कि धार्मिक उपदेशों के विषय तय करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए। एमएमयू ने वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि मिंबर (मस्जिद में खुतबा देने का मंच) से दिए जाने वाले धार्मिक मार्गदर्शन का निर्धारण उलेमा और इमामों का विषय है, किसी प्रशासनिक संस्था का नहीं। इसके विपरीत एमएमयू की मौजूदा पहल 15 सितंबर को आयोजित उलेमा कॉन्फ्रेंस में विभिन्न धार्मिक विद्वानों के बीच बनी सहमति पर आधारित है।
चरार-ए-शरीफ में मीरवाइज ने दिया खुतबा
मीरवाइज-ए-कश्मीर डॉ. मौलवी मोहम्मद उमर फारूक ने चरार-ए-शरीफ स्थित हजरत शेख नूर-उद-दीन नूरानी की ऐतिहासिक खानकाह में जुमे का खुतबा दिया। उन्होंने कहा कि ईमान केवल जुबान से इकरार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव व्यक्ति के चरित्र, आचरण, फैसलों और आपसी लेन-देन में भी दिखाई देना चाहिए। उन्होंने कहा कि अल्लाह पर विश्वास व्यक्ति में जवाबदेही का एहसास पैदा करता है।
मीरवाइज-ए-कश्मीर डॉ. मौलवी मोहम्मद उमर फारूक ने चरार-ए-शरीफ स्थित हजरत शेख नूर-उद-दीन नूरानी की ऐतिहासिक खानकाह में जुमे का खुतबा दिया। उन्होंने कहा कि ईमान केवल जुबान से इकरार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव व्यक्ति के चरित्र, आचरण, फैसलों और आपसी लेन-देन में भी दिखाई देना चाहिए। उन्होंने कहा कि अल्लाह पर विश्वास व्यक्ति में जवाबदेही का एहसास पैदा करता है।
युवाओं के भटकाव और सामाजिक चुनौतियों पर चिंता
युवा पीढ़ी के सामने मौजूद चुनौतियों का जिक्र करते हुए मीरवाइज ने भौतिकवाद, सोशल मीडिया के दुरुपयोग, नैतिक भ्रम और धार्मिक समझ की कमी पर चिंता जताई। उन्होंने माता-पिता, शिक्षकों, उलेमा और धार्मिक संस्थानों से युवाओं के मार्गदर्शन को साझा जिम्मेदारी बनाने की अपील की।
युवा पीढ़ी के सामने मौजूद चुनौतियों का जिक्र करते हुए मीरवाइज ने भौतिकवाद, सोशल मीडिया के दुरुपयोग, नैतिक भ्रम और धार्मिक समझ की कमी पर चिंता जताई। उन्होंने माता-पिता, शिक्षकों, उलेमा और धार्मिक संस्थानों से युवाओं के मार्गदर्शन को साझा जिम्मेदारी बनाने की अपील की।