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Srinagar News: करबलई ने लद्दाख की पहचान का किया जोरदार बचाव, आरोपों को नकारा और शहीदों के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई
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संवाद न्यूज एजेंसी
कारगिल। कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के सह-अध्यक्ष असगर अली करबलई ने बुधवार को इन आरोपों का खंडन किया कि साजिशों के जरिए कुनजेस डोलमा को हाई पावर कमेटी से हटाने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि कुनजेस डोलमा ने लद्दाख के वर्तमान केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे पर संतोष व्यक्त किया है और राज्य का दर्जा या छठी अनुसूची में शामिल होने की किसी भी मांग का स्पष्ट विरोध किया है।
करबलई के अनुसार, कुनजेस डोलमा का मानना है कि कारगिल, जंस्कार, आर्यन वैली और चांगथांग के लोग मौजूदा केंद्र शासित प्रदेश व्यवस्था से संतुष्ट हैं। सभा को संबोधित करते हुए करबलई ने स्पष्ट किया कि उनका कुनजेस डोलमा या किसी भी व्यक्ति से कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं है। हालांकि उन्होंने सख्त चेतावनी दी कि लद्दाख की पहचान को कमजोर करने का कोई भी प्रयास चाहे वह बौद्ध या मुस्लिम समुदाय के भीतर से ही क्यों न हो, बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
उन्होंने पिछले पांच वर्षों में लद्दाख के लोगों द्वारा दिए गए बलिदानों को याद करते हुए पदयात्राओं, भूख हड़तालों, प्रदर्शनों, बंद और हड़तालों जैसे आंदोलनों का उल्लेख किया। उन्होंने 24 सितंबर को लद्दाख के इतिहास की एक अविस्मरणीय तिथि बताते हुए कहा कि उस दिन दिए गए बलिदानों की आवाज सरकार के बहरे कानों तक पहुंचनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लद्दाख अपने शहीदों, गिरफ्तार किए गए युवाओं और आंदोलन में घायल हुए लोगों को कभी नहीं भूलेगा।
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करबलई ने हिरासत में लिए गए युवाओं को “लद्दाख के नायक” बताया और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को एक राष्ट्रीय नायक कहा, जिन्होंने शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत वांगचुक की गिरफ्तारी और लगभग पांच महीने तक जोधपुर जेल में रखे जाने पर दुख व्यक्त किया।
लद्दाखियों को राष्ट्र-विरोधी या पाकिस्तान और चीन का एजेंट बताए जाने के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए करबलई ने ऐसे दावों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा में लद्दाख के योगदान का उल्लेख करते हुए 1948 के जोजिला युद्ध, 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध, 1999 के कारगिल युद्ध और हालिया गलवान संघर्ष की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि ये ऐतिहासिक घटनाएं लद्दाख की अटूट देशभक्ति का प्रमाण हैं।
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कारगिल। कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के सह-अध्यक्ष असगर अली करबलई ने बुधवार को इन आरोपों का खंडन किया कि साजिशों के जरिए कुनजेस डोलमा को हाई पावर कमेटी से हटाने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि कुनजेस डोलमा ने लद्दाख के वर्तमान केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे पर संतोष व्यक्त किया है और राज्य का दर्जा या छठी अनुसूची में शामिल होने की किसी भी मांग का स्पष्ट विरोध किया है।
करबलई के अनुसार, कुनजेस डोलमा का मानना है कि कारगिल, जंस्कार, आर्यन वैली और चांगथांग के लोग मौजूदा केंद्र शासित प्रदेश व्यवस्था से संतुष्ट हैं। सभा को संबोधित करते हुए करबलई ने स्पष्ट किया कि उनका कुनजेस डोलमा या किसी भी व्यक्ति से कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं है। हालांकि उन्होंने सख्त चेतावनी दी कि लद्दाख की पहचान को कमजोर करने का कोई भी प्रयास चाहे वह बौद्ध या मुस्लिम समुदाय के भीतर से ही क्यों न हो, बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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उन्होंने पिछले पांच वर्षों में लद्दाख के लोगों द्वारा दिए गए बलिदानों को याद करते हुए पदयात्राओं, भूख हड़तालों, प्रदर्शनों, बंद और हड़तालों जैसे आंदोलनों का उल्लेख किया। उन्होंने 24 सितंबर को लद्दाख के इतिहास की एक अविस्मरणीय तिथि बताते हुए कहा कि उस दिन दिए गए बलिदानों की आवाज सरकार के बहरे कानों तक पहुंचनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लद्दाख अपने शहीदों, गिरफ्तार किए गए युवाओं और आंदोलन में घायल हुए लोगों को कभी नहीं भूलेगा।
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करबलई ने हिरासत में लिए गए युवाओं को “लद्दाख के नायक” बताया और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को एक राष्ट्रीय नायक कहा, जिन्होंने शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत वांगचुक की गिरफ्तारी और लगभग पांच महीने तक जोधपुर जेल में रखे जाने पर दुख व्यक्त किया।
लद्दाखियों को राष्ट्र-विरोधी या पाकिस्तान और चीन का एजेंट बताए जाने के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए करबलई ने ऐसे दावों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा में लद्दाख के योगदान का उल्लेख करते हुए 1948 के जोजिला युद्ध, 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध, 1999 के कारगिल युद्ध और हालिया गलवान संघर्ष की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि ये ऐतिहासिक घटनाएं लद्दाख की अटूट देशभक्ति का प्रमाण हैं।