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कश्मीर फाइल्स: घाटी में सभी ने झेले आतंक के घाव, फिल्म निर्माता पैसे कमा कर चले गए, पर पंडित अब भी प्रवासी बने हुए
Sun, 01 May 2022 05:53 PM IST
kumar गुलशन कुमार
पीटीआई, श्रीनगर
पीटीआई, श्रीनगर
Published by: kumar गुलशन कुमार
Updated Sun, 01 May 2022 05:53 PM IST
सार
श्रीनगर के 75 वर्षीय हाजी बशीर अहमद वानी बताते हैं कि 1980 के दशक के दौरान घाटी में आतंकवाद की घटनाएं चरम पर थीं। उनके भाई युसुफ वानी को आतंकियों ने दिन के उजाले में मार डाला था।
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द कश्मीर फाइल्स।
- फोटो : amar ujala
विस्तार
फिल्म 'कश्मीर फाइल्स' को लेकर अब भी चर्चाओं का दौर जारी है। घाटी में आतंक के घाव सहने वाले लोगों का कहना है कि इस फिल्म से तीन दशकों से मिले आतंक के घाव की यादें फिर उभर आई हैं। कश्मीर में आतंक का दंश सभी धर्मों के लोगों को झेलने पड़ा है। फिल्म निर्माता तो पैसे कमा कर आगे बढ़ गए, लेकिन कश्मीर पंडित अब भी देश के दूसरे हिस्सों में प्रवासी बन कर रहने को मजबूर हैं।
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श्रीनगर के 75 वर्षीय हाजी बशीर अहमद वानी बताते हैं कि 1980 के दशक के दौरान घाटी में आतंकवाद की घटनाएं चरम पर थीं। उस दौरान कश्मीर में आतंकवाद ने हजारों लोगों को मार डाला, जिसमें राजनीतिक नेता, निर्दोष महिलाएं-पुरुष, पंडित और मुसलमान सभी शामिल रहे। बशीर अहमद ने बताया कि 21 अगस्त 1989 को उनके भाई युसुफ वानी को आतंकियों ने दिन के उजाले में मार डाला था। युसुफ, नेशनल कांफ्रेंस के नेता थे और घाटी में 'यूसुफ हलवाई' के तौर पर जाने जाते थे।
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'मेरे भाई की मृत्यु किस लिए हुई'
बशीर अहमद नम आंखों से कहा, 'मेरे भाई की मृत्यु किस लिए हुई? उसका क्या कसूर था।' कश्मीर फाइल्स फिल्म ने दूरियों को पाटने के बजाय उन्हें बढ़ाने का काम किया है। फिल्म निर्माताओं ने देशभर में सुर्खियां तो बटोर ली, लेकिन अब उनको चाहिए कि वे कश्मीर पंडितों के भलाई के लिए भी कुछ करें।
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तीन बार आतंकियों ने किया हमला
बशीर अहमद भी नेकां के साथ जुड़े हुए हैं और उन पर तीन बार आतंकियों ने हमला किया है। वह बताते हैं कि उनके दाहिने जबड़े में चार गोलियां लगने के बाद भी वे शायद घाटी के दर्द की दास्तान को बताने के लिए बच गए हैं। उन्होंने बताया कि उनका भाई उस दिन किसी की मदद करने के लिए घर से बाहर निकला था, लेकिन फिर कभी लौट कर घर नहीं आया।
दहशतगर्दों ने दोनों समुदायों को दीं कभी न भूलने वाली भयावह यादें
कश्मीर फाइल्स फिल्म में इस घटना का जिक्र किया जाना चाहिए था। वह भी उसने भी अपने देश के लिए जान दी थी। बानी कहते हैं कि उन्होंने कहा कि घाटी में सभी धर्मों के लोग सदियों से भाईचारे के साथ रहते आए हैं। यह सच है कि हमारे पंडित भाइयों और बहनों को अत्याचार सहना पड़ा है। लेकिन, मुसलमानों को भी आंतक ने गहरे जख्म दिए हैं। दोनों समुदायों को दहशतगर्दों ने कभी न भूलने वाली भयावह यादें दी हैं।
सिर्फ उनके भाई को ही नहीं बल्कि उस समय आतंकियों ने 16 प्रमुख राजनेताओं और जाने-माने व्यक्तियों का कत्ल कर दिया गया था। जिनमें वाची से विधायक नजीर अहमद विलूर भी शामिल थे। उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। कश्मीर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति गुलाम कादिर, दूरदर्शन के निदेशक लस्सा कौल सहित कई लोगों को आतंकियों ने निशाना बनाया था।