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केंद्र के जिद्दी रवैये का शिकार है जम्मू-कश्मीर - फारूक
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श्रीनगर। नेशनल कांफ्रेंस (नेकां) के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि जम्मू-कश्मीर केंद्र सरकार के जिद्दी रवैये से परेशान है। उन्होंने केंद्र से अपनी कश्मीर नीति को फिर से परिभाषित करने के लिए आग्रह करते हुए कहा कि यहां के लोग इसकी भारी कीमत चुका रहे हैं। वह शुक्रवार को मध्य कश्मीर के बडगाम जिले के मागम गांव में पार्टी के एक कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे।
डॉ. अब्दुल्ला ने कहा कि ताकत की बदौलत शांति नहीं आ सकती। उन्होंने केंद्र के मेरे रास्ते या हाईवे रवैये पर अफसोस जताते हुए कहा कि कश्मीर में सरकार और उसका प्रशासन धूमधड़ाके और प्रदर्शन में व्यस्त है। उसे जम्मू-कश्मीर के लोग के बीच बढ़ती बेरोजगारी, विकास घाटे, मुद्रास्फीति और गहरे अलगाव जैसे मुद्दों की कोई चिंता नहीं है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जम्मू और कश्मीर में सभी लोकतांत्रिक संस्थानों को एक विशेष राजनीतिक दल के हिसाब से चलने के लिए तब्दील कर दिया गया है। आज हर जगह भय, चिंता और असुरक्षा है। हमारे लोगों, खासकर हमारे युवाओं को हाशिये पर धकेल दिया गया है। श्रीनगर से लोकसभा सांसद डॉ. अब्दुल्ला ने कहा कि कश्मीर में बाहुबली नीति के समर्थकों को एक कदम पीछे हटने और खुद से पूछने की जरूरत है कि क्या ऐसी नीति दुनिया में कहीं और सफल हुई है।
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वर्ष 2019 के बाद कश्मीर के नीति परिदृश्य में बातचीत के लिए कोई जगह नहीं बची है। जबकि यह बातचीत इस क्षेत्र की सांविधानिक और ऐतिहासिक विशिष्टता की विरासत और प्रतीकों पर निर्भर है। इसे बदले बिना कोई प्रगति नहीं हो सकती।
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डॉ. अब्दुल्ला ने कहा कि ताकत की बदौलत शांति नहीं आ सकती। उन्होंने केंद्र के मेरे रास्ते या हाईवे रवैये पर अफसोस जताते हुए कहा कि कश्मीर में सरकार और उसका प्रशासन धूमधड़ाके और प्रदर्शन में व्यस्त है। उसे जम्मू-कश्मीर के लोग के बीच बढ़ती बेरोजगारी, विकास घाटे, मुद्रास्फीति और गहरे अलगाव जैसे मुद्दों की कोई चिंता नहीं है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
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उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जम्मू और कश्मीर में सभी लोकतांत्रिक संस्थानों को एक विशेष राजनीतिक दल के हिसाब से चलने के लिए तब्दील कर दिया गया है। आज हर जगह भय, चिंता और असुरक्षा है। हमारे लोगों, खासकर हमारे युवाओं को हाशिये पर धकेल दिया गया है। श्रीनगर से लोकसभा सांसद डॉ. अब्दुल्ला ने कहा कि कश्मीर में बाहुबली नीति के समर्थकों को एक कदम पीछे हटने और खुद से पूछने की जरूरत है कि क्या ऐसी नीति दुनिया में कहीं और सफल हुई है।
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वर्ष 2019 के बाद कश्मीर के नीति परिदृश्य में बातचीत के लिए कोई जगह नहीं बची है। जबकि यह बातचीत इस क्षेत्र की सांविधानिक और ऐतिहासिक विशिष्टता की विरासत और प्रतीकों पर निर्भर है। इसे बदले बिना कोई प्रगति नहीं हो सकती।