फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Srinagar News ›   jammu kashmir news

हत्या मामले में बरी होने के बावजूद बर्खास्तगी के खिलाफ याचिका खारिज

विज्ञापन
jammu kashmir news
श्रीनगर। उच्चतम न्यायालय ने विभाग से एक पूर्व पुलिस कर्मी की बर्खास्तगी के खिलाफ दाखिल अनुमति याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश ने पिछले साल 13 जुलाई को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय द्वारा उनकी अपील को खारिज करने के खिलाफ पुलिसकर्मी मोहम्मद इकबाल भट द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका पर यह फैसला दिया।
विज्ञापन

अभियोजन पक्ष के अनुसार वर्ष 2009 में दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले में नवाज अहमद भट की हत्या कर दी गई थी। इसमें उनकी सुरक्षा में तैनात पुलिस कर्मी मोहम्मद इकबाल भट को तीन महीने तक फरार रहने के बाद एक दिसंबर 2009 को गिरफ्तार कर लिया गया था। मामले में 21 अक्तूबर 2010 को दाखिल चार्जशीट में इकबाल पर बिना किसी पूर्व अनुमति के अवकाश पर रहने और हत्या में शामिल होने का आरोप था। जम्मू-कश्मीर पुलिस विभाग ने बिना अनुमति के ड्यूटी से अनुपस्थित रहने को अशोभनीय आचरण मानते हुए पांच फरवरी 2011 को इकबाल को सेवा से बर्खास्त कर दिया, जबकि मामले की सुनवाई कर रही हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 29 जून 2015 को हत्या में शामिल होने के आरोप से मुक्त कर दिया। फैसला सुनाए जाने तक वह न्यायिक हिरासत में रहे।
विज्ञापन

-----------
बर्खास्तगी का बरी होने से कोई सरोकार नहीं
इकबाल ने अपनी बर्खास्तगी को हाईकोर्ट में चुनौती दी। इस पर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति संजय धर की खंडपीठ ने कहा था कि आपराधिक मामले में याचिकाकर्ता इकबाल को बरी किए जाने का उसके खिलाफ पारित बर्खास्तगी के आरोप से कोई सरोकार नहीं है, क्योंकि इकबाल को आपराधिक मामले में बरी किए जाने से बहुत पहले सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इकबाल को 5 फरवरी 2011 को बर्खास्तगी की सजा दी गई थी, जबकि 29 जून 2015 को उसे हत्या में शामिल होने के आरोप से बरी किया गया। यह स्थापित कानून है कि आपराधिक मामले के साथ अनुशासनात्मक कार्यवाही एक साथ जारी रह सकती है। आपराधिक मामला केवल नवाज अहमद भट की हत्या में याचिकाकर्ता अपीलकर्ता (इकबाल) की संलिप्तता के संबंध में था और बिना सूचना और पूर्व अनुमति या कर्तव्य के परित्याग के उनके कर्तव्यों को छोड़ने से कोई सरोकार नहीं था। उच्च न्यायालय ने उस समय कहा था दोनों मामलों में स्वतंत्र साक्ष्य जोड़े गए थे। यह भी अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त है कि आपराधिक मामले में दर्ज निष्कर्ष सिविल कार्यवाही या अनुशासनात्मक मामलों में बाध्यकारी नहीं हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed