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एक साल से चरागाहों में नहीं जा पा रहे एलएसी के बाशिंदे
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जम्मू/लेह। लद्दाख की गलवां घाटी में चीनी सेना से भीषण झड़प के एक साल बाद भी चरागाहों पर लगी पाबंदी नहीं हटी है। गलवां से लेकर चुशुल और अन्य अग्रिम इलाकों में एक साल के भीतर सड़काें का जाल बिछ गया है। सामरिक मोर्चों पर पहले से कहीं ज्यादा मजबूती लाई गई है, लेकिन एलएसी से सटे इलाकों में रह रहे लोगों का जीवन अभी भी अनिश्चितता से बाहर नहीं आ पाया है।
एलएसी पर तनाव से सबसे ज्यादा प्रभावित चुशुल क्षेत्र रहा है। इस इलाके में बारह गांव पड़ते हैं, जिनमें से आठ फोबरंग, मान, मेरक, चुशुल, युगुर, खकतेक, लुकुंग और स्पंगमिक एलएसी से सटे हुए हैं। पिछले एक साल में एलएसी पर जो कुछ भी घटा इसका सीधा असर इन गांवों की करीब दो हजार आबादी पर पड़ा। इन गांवों के बाशिंदों को ब्लैकआउट की वजह से बिना बिजली के रहना पड़ा। दूरसंचार सेवाएं भी नहीं हैं। एक साल बाद हालात कुछ बेहतर हुए हैं लेकिन जीवन पूरी तरह से पटरी पर नहीं लौट पाया है। लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद लेह के चुशुल क्षेत्र से पार्षद कोंचोक स्टैजिन ने बताया कि चुशुल के सामने ब्लैक टॉप और गुरुंग हिल से सेनाएं पीछे हट चुकी हैं, लेकिन एलएसी से सटे चरागाहों को नो मैंस लैंड घोषित किया गया है। स्थानीय लोग माल मवेशी लेकर इन चरागाहों पर अभी नहीं जा सकते हैं। स्टैंजिन कहते हैं कि सड़काें की स्थिति काफी बेहतर हुई है। दूरसंचार सेवाएं शुरू करने के प्रयास चल रहे हैं लेकिन जमीनी स्तर पर स्थितियां बदलने में ज्यादा समय लग रहा है, जिस पर सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए।
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लद्दाख में और आक्रामक होने की जरूरत : स्तोबदान
भारत-चीन रिश्तों के जानकार फुनसोग स्तोबदान का कहना है कि लद्दाख में बीते वर्ष जो हालात बने, उससे उपजे तनाव से दोनों देश अभी बाहर नहीं आ पाए हैं। एक तरह से गतिरोध अभी भी जारी है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को रिपोर्ट देने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय में सेवाएं दे चुके स्तोबदान के अनुसार लद्दाख में चीन की चाल पर भारत ने आक्रामक रुख अपनाया। इसे आगे भी जारी रखना होगा। जिस तरह से सड़क नेटवर्क में बेहतरी की गई है, उसी तरह से रणनीतिक योजनाओं में भी बदलाव लाया जाना चाहिए। गोगरा पोस्ट, हॉट स्प्रिंग्स और डेपसांग में चीन पीछे नहीं हटा है। यह चीन की मंशा को दर्शाता है। चीन से रिश्तों को लेकर थिंकटैंक को और सक्रिय करना होगा। चीन अब अफगानिस्तान तक सोच रहा है। भारत को भी सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस पूरे हिस्से पर रणनीति में आक्रामकता लानी होगी।
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एलएसी पर तनाव से सबसे ज्यादा प्रभावित चुशुल क्षेत्र रहा है। इस इलाके में बारह गांव पड़ते हैं, जिनमें से आठ फोबरंग, मान, मेरक, चुशुल, युगुर, खकतेक, लुकुंग और स्पंगमिक एलएसी से सटे हुए हैं। पिछले एक साल में एलएसी पर जो कुछ भी घटा इसका सीधा असर इन गांवों की करीब दो हजार आबादी पर पड़ा। इन गांवों के बाशिंदों को ब्लैकआउट की वजह से बिना बिजली के रहना पड़ा। दूरसंचार सेवाएं भी नहीं हैं। एक साल बाद हालात कुछ बेहतर हुए हैं लेकिन जीवन पूरी तरह से पटरी पर नहीं लौट पाया है। लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद लेह के चुशुल क्षेत्र से पार्षद कोंचोक स्टैजिन ने बताया कि चुशुल के सामने ब्लैक टॉप और गुरुंग हिल से सेनाएं पीछे हट चुकी हैं, लेकिन एलएसी से सटे चरागाहों को नो मैंस लैंड घोषित किया गया है। स्थानीय लोग माल मवेशी लेकर इन चरागाहों पर अभी नहीं जा सकते हैं। स्टैंजिन कहते हैं कि सड़काें की स्थिति काफी बेहतर हुई है। दूरसंचार सेवाएं शुरू करने के प्रयास चल रहे हैं लेकिन जमीनी स्तर पर स्थितियां बदलने में ज्यादा समय लग रहा है, जिस पर सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए।
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लद्दाख में और आक्रामक होने की जरूरत : स्तोबदान
भारत-चीन रिश्तों के जानकार फुनसोग स्तोबदान का कहना है कि लद्दाख में बीते वर्ष जो हालात बने, उससे उपजे तनाव से दोनों देश अभी बाहर नहीं आ पाए हैं। एक तरह से गतिरोध अभी भी जारी है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को रिपोर्ट देने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय में सेवाएं दे चुके स्तोबदान के अनुसार लद्दाख में चीन की चाल पर भारत ने आक्रामक रुख अपनाया। इसे आगे भी जारी रखना होगा। जिस तरह से सड़क नेटवर्क में बेहतरी की गई है, उसी तरह से रणनीतिक योजनाओं में भी बदलाव लाया जाना चाहिए। गोगरा पोस्ट, हॉट स्प्रिंग्स और डेपसांग में चीन पीछे नहीं हटा है। यह चीन की मंशा को दर्शाता है। चीन से रिश्तों को लेकर थिंकटैंक को और सक्रिय करना होगा। चीन अब अफगानिस्तान तक सोच रहा है। भारत को भी सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस पूरे हिस्से पर रणनीति में आक्रामकता लानी होगी।
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