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वर्दी का फर्ज, शहादत की विरासत : पिता की राह पर चलकर बेटे ने दिया सर्वोच्च बलिदान

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अमर उजाला ब्यूरो, श्रीनगर।
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मध्य कश्मीर के बडगाम जिले के लालपोरा निवासी हेड कांस्टेबल आशिक हुसैन कुरैशी की शहादत ने परिवार की तीन दशक पुरानी पीड़ा को फिर ताजा कर दिया। वर्ष 1995 में उनके पिता हेड कांस्टेबल गुलाम मोहिउद्दीन कुरैशी की भी ड्यूटी के दौरान जान चली गई थी। अब बेटे ने भी खाकी वर्दी का फर्ज निभाते हुए देश सेवा में सर्वोच्च बलिदान दिया है।
परिजन ने बताया कि हमले से करीब एक घंटे पहले ही आशिक हुसैन ने घर पर फोन कर परिवार से सामान्य बातचीत की थी। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह उनकी आखिरी बातचीत होगी। लगभग 45 वर्षीय आशिक हुसैन अपने पीछे पत्नी, दो बेटे, एक बेटी, वृद्ध मां, एक भाई और तीन विवाहित बहनों का परिवार छोड़ गए हैं। ग्रामीणों के अनुसार वह बेहद सरल, कर्तव्यनिष्ठ और मिलनसार स्वभाव के थे।
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यह शहादत उस परिवार के लिए दूसरी बड़ी त्रासदी है। वर्ष 1995 में आशिक हुसैन के पिता हेड कांस्टेबल गुलाम मोहिउद्दीन कुरैशी की रामबन जिले में ड्यूटी के दौरान भूस्खलन में मृत्यु हो गई थी। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी संभालने और उनकी सेवा परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए आशिक हुसैन की नियुक्ति एसआरओ-43 के तहत जम्मू-कश्मीर पुलिस में हुई थी। तीन दशक बाद उसी परिवार ने वर्दी का फर्ज निभाते हुए अपना दूसरा सदस्य भी खो दिया।
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अनंतनाग। जिला पुलिस लाइन अनंतनाग में जब आशिक हुसैन कुरैशी का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा पहुंचा तो पूरा परिसर गमगीन हो उठा। श्रद्धांजलि समारोह के दौरान पत्नी, बच्चों व अन्य परिजन का विलाप सुनकर वहां मौजूद अधिकारी और जवान भी भावुक हो गए। जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक (डीजीपी) नलिन प्रभात, स्पेशल डीजी (समन्वय) एसजेएम गिलानी, आईजीपी कश्मीर वीके बिर्दी, डीआईजी दक्षिण कश्मीर रेंज जावेद इकबाल मट्टू और एसएसपी अनंतनाग आमोद अशोक नागपुरे ने पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित कर अंतिम सलामी दी। सेना की विक्टर फोर्स, बीएसएफ, सीआरपीएफ तथा नागरिक प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी श्रद्धासुमन अर्पित किए। श्रद्धांजलि समारोह के बाद पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए उनके पैतृक गांव बीरवाह रवाना किया गया।
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