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Srinagar News: हाईकोर्ट ने जाली मेडिकल लगाने वाले कर्मी की याचिका की खारिज
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर राज्य सड़क परिवहन निगम के एक पूर्व कर्मचारी की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने पाया कि उसने ड्यूटी से लंबे समय तक गैरहाजिर रहने को सही ठहराने के लिए अदालत में जाली मेडिकल सर्टिफिकेट पेश किया था।
जस्टिस संजय धर की बेंच ने रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल श्रीनगर को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता बीए गनई के खिलाफ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष मुकदमा चलाने के लिए आपराधिक शिकायत दर्ज की जाए। गनई ने निगम के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें 21 अक्टूबर 2011 से दोबारा नौकरी जॉइन करने तक की अवधि को डीज नॉन माना गया था। उसने मांग की थी कि इस अवधि को ड्यूटी माना जाए और सभी सेवा लाभ दिए जाएं।
विवाद तब शुरू हुआ जब गनई की सेवाएं जून 2006 में कथित अनधिकृत अनुपस्थिति के कारण समाप्त कर दी गईं। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने दिसंबर 2017 में उसकी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया और बहाली का निर्देश दिया। निगम को उसकी कथित अनधिकृत अनुपस्थिति की जांच करने की अनुमति दी गई थी। बहाली के बाद जांच शुरू की गई और निगम ने एक नवंबर 2004 से 20 अक्टूबर 2011 तक की उसकी अनुपस्थिति को किसी भी प्रकार की देय छुट्टी के रूप में माना, जबकि उसके बाद जॉइनिंग तक की अवधि को डीज नॉन माना गया।
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कोर्ट में गनई ने सरकारी मानसिक रोग अस्पताल श्रीनगर के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की ओर से जारी मेडिकल सर्टिफिकेट का हवाला दिया। इसमें दावा किया गया था कि वह जनरल एंग्जायटी डिसऑर्डर से पीड़ित था। नवंबर 2004 से अक्टूबर 2011 तक इलाज में रहा। निगम ने सर्टिफिकेट की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया, जिसके बाद कोर्ट ने स्वास्थ्य अधिकारियों से विस्तृत सत्यापन रिपोर्ट मांगी। सत्यापन में पता चला कि गनई की ओर से पेश किया गया सर्टिफिकेट फर्जी था। मेडिकल सुपरिंटेंडेंट ने कोर्ट को बताया कि उसी नंबर और तारीख का एक सर्टिफिकेट वास्तव में जारी किया गया था, लेकिन गनई की ओर से पेश किए गए सर्टिफिकेट में कुछ अतिरिक्त वाक्य जोड़े गए थे, जिनमें कहा गया था कि वह एक नवंबर 2004 से 20 अक्टूबर 2011 तक उसका इलाज चला। प्रमाणपत्र पर उसकी फोटो भी लगी थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि गनई ने सेवा से अपनी लंबी अनुपस्थिति को सही ठहराने के खास मकसद से अतिरिक्त बयान जोड़े थे। हालांकि कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि गनई मनोरोग अस्पताल का मरीज रहा है, लेकिन इससे उसके पेश किए गए जाली सर्टिफिकेट को वैध नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने गनई के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि अस्पताल ने कहा था कि संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की रिट क्षेत्राधिकार का सहारा लेने वाले व्यक्ति को साफ हाथों से कोर्ट में आना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब रिट याचिका का आधार ही धोखाधड़ी वाले दस्तावेज या तोड़े-मरोड़े गए तथ्यों पर टिका हो, तो कोर्ट अंतर्निहित दावे के गुण-दोष पर जाए बिना ही याचिकाकर्ता का मामला खारिज करने के लिए उचित है। कोर्ट ने कहा, यदि रिट याचिका का आधार ही जाली दस्तावेज या तोड़े-मरोड़े गए तथ्यों पर टिका है, तो रिट कोर्ट ऐसे याचिकाकर्ता के मामले को गुण-दोष पर जाए बिना खारिज करने के लिए उचित होगी। हाईकोर्ट ने आगे कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया भारतीय न्याय संहिता की धारा 336 और 340 के तहत जालसाजी और जाली दस्तावेज के इस्तेमाल से संबंधित अपराधों को दर्शाती है।
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जस्टिस संजय धर की बेंच ने रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल श्रीनगर को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता बीए गनई के खिलाफ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष मुकदमा चलाने के लिए आपराधिक शिकायत दर्ज की जाए। गनई ने निगम के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें 21 अक्टूबर 2011 से दोबारा नौकरी जॉइन करने तक की अवधि को डीज नॉन माना गया था। उसने मांग की थी कि इस अवधि को ड्यूटी माना जाए और सभी सेवा लाभ दिए जाएं।
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विवाद तब शुरू हुआ जब गनई की सेवाएं जून 2006 में कथित अनधिकृत अनुपस्थिति के कारण समाप्त कर दी गईं। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने दिसंबर 2017 में उसकी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया और बहाली का निर्देश दिया। निगम को उसकी कथित अनधिकृत अनुपस्थिति की जांच करने की अनुमति दी गई थी। बहाली के बाद जांच शुरू की गई और निगम ने एक नवंबर 2004 से 20 अक्टूबर 2011 तक की उसकी अनुपस्थिति को किसी भी प्रकार की देय छुट्टी के रूप में माना, जबकि उसके बाद जॉइनिंग तक की अवधि को डीज नॉन माना गया।
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कोर्ट में गनई ने सरकारी मानसिक रोग अस्पताल श्रीनगर के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की ओर से जारी मेडिकल सर्टिफिकेट का हवाला दिया। इसमें दावा किया गया था कि वह जनरल एंग्जायटी डिसऑर्डर से पीड़ित था। नवंबर 2004 से अक्टूबर 2011 तक इलाज में रहा। निगम ने सर्टिफिकेट की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया, जिसके बाद कोर्ट ने स्वास्थ्य अधिकारियों से विस्तृत सत्यापन रिपोर्ट मांगी। सत्यापन में पता चला कि गनई की ओर से पेश किया गया सर्टिफिकेट फर्जी था। मेडिकल सुपरिंटेंडेंट ने कोर्ट को बताया कि उसी नंबर और तारीख का एक सर्टिफिकेट वास्तव में जारी किया गया था, लेकिन गनई की ओर से पेश किए गए सर्टिफिकेट में कुछ अतिरिक्त वाक्य जोड़े गए थे, जिनमें कहा गया था कि वह एक नवंबर 2004 से 20 अक्टूबर 2011 तक उसका इलाज चला। प्रमाणपत्र पर उसकी फोटो भी लगी थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि गनई ने सेवा से अपनी लंबी अनुपस्थिति को सही ठहराने के खास मकसद से अतिरिक्त बयान जोड़े थे। हालांकि कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि गनई मनोरोग अस्पताल का मरीज रहा है, लेकिन इससे उसके पेश किए गए जाली सर्टिफिकेट को वैध नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने गनई के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि अस्पताल ने कहा था कि संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की रिट क्षेत्राधिकार का सहारा लेने वाले व्यक्ति को साफ हाथों से कोर्ट में आना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब रिट याचिका का आधार ही धोखाधड़ी वाले दस्तावेज या तोड़े-मरोड़े गए तथ्यों पर टिका हो, तो कोर्ट अंतर्निहित दावे के गुण-दोष पर जाए बिना ही याचिकाकर्ता का मामला खारिज करने के लिए उचित है। कोर्ट ने कहा, यदि रिट याचिका का आधार ही जाली दस्तावेज या तोड़े-मरोड़े गए तथ्यों पर टिका है, तो रिट कोर्ट ऐसे याचिकाकर्ता के मामले को गुण-दोष पर जाए बिना खारिज करने के लिए उचित होगी। हाईकोर्ट ने आगे कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया भारतीय न्याय संहिता की धारा 336 और 340 के तहत जालसाजी और जाली दस्तावेज के इस्तेमाल से संबंधित अपराधों को दर्शाती है।