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महिलाएं ही झेल रहीं आतंकवाद का सबसे विषैला दंश

Sat, 09 Mar 2013 05:32 AM IST
Sri nagar
Sri nagar Updated Sat, 09 Mar 2013 05:32 AM IST
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श्रीनगर। आंतकवाद का सबसे विषैला दंश महिलाओं ने ही झेला है। कश्मीर में पीड़ित महिलाओं की संख्या हजारों में हैं जो आज भी आतंकवाद की मार भुगत रही हैं। महिला पंच जुना बेगम के दर्द में हर पीड़ित महिला की कथा छिपी है। इस महिला पंच ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर अपने संदेश में औरतों पर जुर्म बंद करने की गुहार लगाई है। वह कहती है कि किसी भी मजहब में औरतों पर जुल्म को सही नहीं ठहराया गया है लेकिन हर बार महिलाएं ऐसी घटनाओं की शिकार होती रही हैं। कई महिलाएं ऐसी भी हैं जिनके पति लंबे समय से लापता हैं लेकिन उनकी तलाश नहीं हो पा रही है । आंतकवाद के शिकार हुए पुरुषों की विधवाएं हर पल पीड़ा भोगती रही हैं। ऐसी विधवाओं की संख्या तीस हजार के करीब है। घाटी में औरतों को निशाना बनाए जाने का क्रम अभी थमा नहीं है। जिंदगी और मौत की लंबी लड़ाई लड़ चुकी जुना बेगम पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं हो पाई है। 12 जनवरी को शाम करीब सात बजे अपने घर में ही अज्ञात हमलावरों का शिकार हुई इस महिला ने हिम्मत से मौत को तो परास्त कर दिया लेकिन जिंदगी की इस जंग में उसे एक आंख के साथ अपना मानसिक संतुलन भी गवांना पड़ा है। डेढ़ महीने तक कश्मीर के सबसे बेहतरीन अस्पताल स्किम में डाक्टरों ने उसकी सांसें तो बंद नहीं होने दी लेकिन वह एक जिंदा लाश बनकर रह गई है। अमर उजाला से बातचीत के दौरान वह सरकार से भी खासी नाराज दिखी। पेशे से कुम्हार परिवार से संबंधित इस महिला ने कहा कि गांव वालों के साथ अच्छा मेल मिलाप होने के कारण वह पंच तो बना दी गई लेकिन उसेक्या मालूम था कि यह पद ही उसकी जिंदगी पर पहाड़ बनकर टूटेगा। घटना को याद करके वह अब भी सिहर उठती है। कहती है कि मुझे अच्छी तरह याद है वो रोशनी जिसने कुछ समय की लिए उसकी आंखों का चौंधिया दिया था। टार्च की तेज रोशनी उसकी आंखों पर पड़ी और एक अनजान आवाज ने उससे केवल यही पूछा आप ही जुना हो और हां कहते ही गोलियों की बौछार से उसे छलनी कर दिया।अस्पताल के बिस्तर पर उसको कई दिनों के बाद होश आया । आला अधिकारियों तथा नेताओं के अलावा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी उनका हालचाल जानने अस्पताल में गए थे।
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मुख्यमंत्री के निर्देश पर डाक्टरों ने उसका इलाज तो कर दिया लेकिन खर्च अलग से भी हुआ जिसे उसके पति ने रिश्तेदारों से उधार लेकर जुटाया था। अब इस कर्ज की वापसी सबसे बड़ी समस्या बन गई है। हमले के बाद वह काम करने के लायक नहीं रही। इतना ही नहीं अब भी उसे इलाज के लिए प्रति माह 1500 रुपये की जरुरत होती है।
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