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भगवान को पहचानने के लिए दिव्य दृष्टि चाहिए : सुचेतानंद
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सत्संग सुनती संगत।
- फोटो : nowshera news
नौशेरा। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की तरफ से लीकी, बेटीपटन में भजन संकीर्तन का आयोजन किया गया।
इस दौरान स्वामी सुचेतानंद ने बताया कि शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण को पहचान नहीं पाया। केवल शिशुपाल ही नहीं बल्कि उस समय के अनेकों राजा भी भगवान श्रीकृष्ण को पहचान नहीं पाये। यदि आज भगवान हमारे सामने आ जाते हैं तो हम भगवान को पहचान लेंगे। हमारे पास भगवान को पहचानने का क्या आधार होगा, क्या उनकी बाहरी वेशभूषा? यदि हम ऐसा सोचते हैं तो इसका मतलब अभी तक हमने अपने धार्मिक ग्रंथों का सही ढंग से अध्ययन ही नहीं किया। बाहरी वेश भूषा तो कोई भी धारण कर सकता है।
इसलिए भगवान को पहचानने के लिए आवश्यकता है उस दिव्य दृष्टि की जो दिव्य दृष्टि भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को प्रदान की थी। स्वामी जी ने बताया कि भक्त प्रह्लाद के जीवन में अनेकों ही संकट आए लेकिन वह अपने भक्ति पथ से विचलित नहीं हुए, क्योंकि उनका अपने श्री हरि पर अपने नारायण पर पूर्ण विश्वास था।
यदि हम भी चाहते हैं कि हमारा भी विश्वास भक्त प्रह्लाद की भांति हो तो हमें भी आवश्यकता है उस ईश्वर को जानने की। भक्त प्रह्लाद के भीतर जो अद्भुत भक्ति बल था उसके पीछे कहीं न कहीं उनकी मां द्वारा दिए गए संस्कार थे। जिसने उन्हें महान भक्त बना दिया।
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इस दौरान स्वामी सुचेतानंद ने बताया कि शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण को पहचान नहीं पाया। केवल शिशुपाल ही नहीं बल्कि उस समय के अनेकों राजा भी भगवान श्रीकृष्ण को पहचान नहीं पाये। यदि आज भगवान हमारे सामने आ जाते हैं तो हम भगवान को पहचान लेंगे। हमारे पास भगवान को पहचानने का क्या आधार होगा, क्या उनकी बाहरी वेशभूषा? यदि हम ऐसा सोचते हैं तो इसका मतलब अभी तक हमने अपने धार्मिक ग्रंथों का सही ढंग से अध्ययन ही नहीं किया। बाहरी वेश भूषा तो कोई भी धारण कर सकता है।
इसलिए भगवान को पहचानने के लिए आवश्यकता है उस दिव्य दृष्टि की जो दिव्य दृष्टि भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को प्रदान की थी। स्वामी जी ने बताया कि भक्त प्रह्लाद के जीवन में अनेकों ही संकट आए लेकिन वह अपने भक्ति पथ से विचलित नहीं हुए, क्योंकि उनका अपने श्री हरि पर अपने नारायण पर पूर्ण विश्वास था।
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यदि हम भी चाहते हैं कि हमारा भी विश्वास भक्त प्रह्लाद की भांति हो तो हमें भी आवश्यकता है उस ईश्वर को जानने की। भक्त प्रह्लाद के भीतर जो अद्भुत भक्ति बल था उसके पीछे कहीं न कहीं उनकी मां द्वारा दिए गए संस्कार थे। जिसने उन्हें महान भक्त बना दिया।
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