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दंगों का दर्द भूल, मिसाल बन रहे मुस्लिम कारीगर

Tue, 24 Sep 2013 09:37 AM IST
अमर उजाला, जम्मू
अमर उजाला, जम्मू Updated Tue, 24 Sep 2013 09:37 AM IST
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muslim artists working for dashahara in jammu

मुजफ्फरनगर दंगों के जख्म अब भी हरे हैं, वहीं दूसरी ओर जम्मू में मेरठ के मैनापुठी गांव के कारीगर सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम कर रहे हैं।

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परेड ग्राउंड के पास स्थित गीता भवन में दशहरे के लिए रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतलों को तैयार करने के लिए मेरठ से लगभग तीस बत्तीस कारीगर पहुंचे हुए हैं।
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पुतले बनाने वाले कारीगर अधिकतर मुस्लिम समुदाय से संबंध रखने वाले हैं जो पुतले बनाने के लिए धर्म के बंधन में न बंधते हुए अपनी कला के माध्यम से भाईचारे और शांति की मिसाल को बखूबी पेश कर रहे हैं।
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मुस्लिम कारीगरों के अलावा हिंदू कारीगर भी हैं जो मिलजुल कर एक दूसरे की मदद से काफी संख्या में पुतलों को तैयार करके जम्मू संभाग के विभिन्न जिलों और इलाकों में पुतले सप्लाई करते हैं।

27-28 सालों से आ रहे
मेरठ से आये कारीगर मोहम्मद ग्यासुदीन ने बताया कि वह पिछले 27-28 वर्षों से जम्मू में आकर दशहरे के लिए पुतले तैयार करने का काम कर रहे हैं।
 
उन्होंने बताया कि अभी पुतले बनाने का काम शुरू हो गया है जो दशहरे के त्योहार से ठीक दो-तीन दिन पहले तैयार हो जाएंगे। मोहम्मद ग्यासुदीन ने बताया कि वह अपने मन में धर्म या सांप्रदायिकता की भावना को नहीं रखते हुए कला के माध्यम से लोगों के बीच भाईचारे और शांति के संदेश को बांटना चाहते हैं।

पुतले बनाना काफी पसंद

उन्होंने बताया कि पुतले बनाने वाले कारीगर ज्यादातर खेतीबाड़ी, मजदूरी और अन्य कामों के साथ जुड़े हुए हैं और सभी कारीगर दशहरे के मौके पर ही पुतले बनाने का काम करते हैं।


उन्होंने बताया कि कारीगरों का कला के प्रति झुकाव होने के कारण वह पुतले बनाना काफी पसंद करते हैं और कला प्रेमियों के लिए धर्म का बंधन कोई भी मायने नहीं रखता है।

वैष्णो धाम की यात्रा करने के लिए जाएंगे
उन्होंने बताया कि उनके द्वारा बनाए पुतले गांधी नगर, परेड, अखनूर, रियासी, उधमपुर, रामनगर, सुंदरबनी, राजोरी, आरएस पुरा, छन्नी, रेशम घर कालोनी और सैनिक कालोनी में भेजा जाता है। उन्होंने बताया कि दशहरे के बाद वह अपने साथी कारीगरों के साथ वैष्णो धाम की यात्रा करने के लिए जाएंगे।

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