{"_id":"604283048ebc3ee646386703","slug":"where-the-sound-of-explosions-used-to-be-heard-throughout-the-night-now-there-is-silence-from-the-sound-of-the-beetles-kathua-news-jmu2306521113","type":"story","status":"publish","title_hn":"रात भर जहां सुनाई देती थी धमाकों की आवाज, वहां अब झींगुरों की आवाज से टूटता है सन्नाटा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
रात भर जहां सुनाई देती थी धमाकों की आवाज, वहां अब झींगुरों की आवाज से टूटता है सन्नाटा
विज्ञापन
बोबिया में तारबंदी के नजदीक घास काटते किसान।
- फोटो : KATHUA
हीरानगर। भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम समझौते के बाद सीमावर्ती इलाकों में लोगों की जिंदगी में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा है। शांति बहाल होने के साथ ही सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों की जिंदगी पटरी पर लौटने लगी है। जो इलाके पाकिस्तानी गोलाबारी और बीएसएफ की जवाबी कार्रवाई से दहल उठते थे, वहां 24 फरवरी के बाद शांति है। सीमावर्ती लोग यही प्रार्थना कर रहे हैं कि गोलाबारी की आवाज फिर कभी सुनाई न दे।
बदले माहौल में किसान तारबंदी के नजदीक तक खेतों में आ जा रहे हैं। पहले उन्हें तय समय में ही इन खेतों में जाना होता था। वहीं, शाम ढलने तक हर हाल में घर लौटना पड़ता था। लोगों का कहना है कि दशकों बाद एक-दूसरे के घर के आंगन में बैठकर दुख सुख साझा करना नसीब हुआ है। बच्चे भी बेखौफ होकर गली-मोहल्ले और स्कूल में खेलने लगे हैं। गोलाबारी बंद होने से बच्चे तनाव मुक्त होकर पढ़ाई कर पा रहे हैं, जबकि पहले शाम ढलते ही उनकी धड़कनें तेज हो जाती थीं। लोगों का कहना यह भी है कि अगर पाकिस्तान समझौते पर कायम रहा, तो सीमा के दोनों तरफ के लोगों की जिंदगी में कई बदलाव होंगे। अब यही कामना है कि हमेशा इसी तरह का माहौल बना रहे। समझौते के चलते सीमा पर चल रहे सुरक्षा बांध बनाने का कार्य भी तेज गति से हो रहा है। दिन रात यहां मशीनें काम कर रही हैं।
सीमा पर 10247 कनाल भूमि आबाद होने की उम्मीद
हीरानगर सेक्टर में तारबंदी के आगे करीब 10247 कनाल जमीन पर दशकों से खेती नहीं ही पाई है। अब उम्मीद जताई जा रही है कि यह जमीन आबाद होगी। हालांकि, किसानों का कहना है कि पाकिस्तान पर इतनी जल्दी भरोसा नहीं किया जा सकता। कुछ समय देखने के बाद ही तारबंदी के आगे के खेतों में जाना सही होगा। बीएसएफ ने पहले भी कई बार किसानों को तारबंदी के आगे खेती करने को कहा। यही नहीं मानियारी में पिछले साल प्रशासन ने बीएसएफ के सहयोग से तारबंदी के आगे 13 सौ कनाल जमीन पर गेंहू बोई, ताकि यहां किसानों को खेती करने के लिए आकर्षित किया जा सके।
विज्ञापन
पाकिस्तान की हर गतिविधि पर नजर बनाए हैं जवान
सीजफायर समझौते के बाद भी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सीमा सुरक्षा बल के जवान पूरी तरह से मुस्तैद हैं। पहले भी पाकिस्तान इस तरह के समझौते का उल्लंघन कर चुका है। इसलिए उस पर भरोसा करना आसान नहीं है। बीएसएफ की ओर से तारबंदी के पास उसी तरह से आज भी गश्त की जा रही है, जैसे सीजफायर समझौते से पहले की जाती थी। सीमा पार की हर गतिविधि पर बीएसएफ के जवान पैनी नजर बनाए हुए हैं।
बच्चे पढ़ाई के साथ खेल मैदान में भी मचा रहे धमाल
आईबी से मात्र कुछ दूरी पर लडवाल स्कूल में जो बच्चे पहले बंद कमरों में बैठकर पढ़ते थे। अब शांत माहौल में पढ़ाई कर रहे हैं और खेल मैदान में धमाल भी मचा रहे हैं। पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली मन्नू शर्मा ने कहा कि गोलाबारी के दौरान डर लगता था कि न जाने कब गोला स्कूल में गिर जाए। जब कभी गोलाबारी तेज हो जाती थी तो हम कई दिनों तक स्कूल भी नहीं आ पाते थे। स्कूल के शिक्षक कुलदीप राज ने बताया कि गोलाबारी के दौरान बच्चे सहम जाते थे। कई बार हम इनके परिवार वालों को कहते थे कि छोटे बच्चों को माहौल शांत होने तक स्कूल न भेजें। अब उम्मीद है कि स्कूल में बच्चों की संख्या भी बढ़ेगी।
समझौते से जिंदगी में आए कई बदलाव
बोबिया गांव के सुभाष सिंह ने बताया कि उनका गांव जीरो लाइन के पास है। कई बार पाकिस्तान ने गांव को निशाना बनाया है। सीजफायर समझौते के बाद करीब एक सप्ताह से गोलाबारी बंद है। हम घरों में चैन की नींद सो पा रहे हैं। बच्चे देर रात तक घर के आंगन में खेलते हैं। खेतों में चले जाएं, तो आने में शाम भी हो जाए तो भी घरवाले ज्यादा चिंतित नहीं होते हैं।
पहले खेत से लौटने तक अटकी रहती थीं सांसें
जगदीप सिंह ने कहा कि खेतों में काम करने तो पहले भी जाते थे। अब भी जा रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले हर वक्त गोलाबारी का डर रहता था। घर लौटने तक बीवी बच्चों की सांसें अटकी रहती थीं। अब हम अपनी मर्जी से जब चाहें खेत जा रहे हैं। पशुओं के लिए चारे का इंतजाम भी सही ढंग से हो रहा है। पहले सब काम निपटाने के बाद शाम ढलते ही घरों में दुबक जाते थे। अब खेतों में काम करने के बाद शाम को कुछ समय के लिए गली में गांव के लोगों के साथ गपशप भी मार लेते हैं। (संवाद)
विज्ञापन
बदले माहौल में किसान तारबंदी के नजदीक तक खेतों में आ जा रहे हैं। पहले उन्हें तय समय में ही इन खेतों में जाना होता था। वहीं, शाम ढलने तक हर हाल में घर लौटना पड़ता था। लोगों का कहना है कि दशकों बाद एक-दूसरे के घर के आंगन में बैठकर दुख सुख साझा करना नसीब हुआ है। बच्चे भी बेखौफ होकर गली-मोहल्ले और स्कूल में खेलने लगे हैं। गोलाबारी बंद होने से बच्चे तनाव मुक्त होकर पढ़ाई कर पा रहे हैं, जबकि पहले शाम ढलते ही उनकी धड़कनें तेज हो जाती थीं। लोगों का कहना यह भी है कि अगर पाकिस्तान समझौते पर कायम रहा, तो सीमा के दोनों तरफ के लोगों की जिंदगी में कई बदलाव होंगे। अब यही कामना है कि हमेशा इसी तरह का माहौल बना रहे। समझौते के चलते सीमा पर चल रहे सुरक्षा बांध बनाने का कार्य भी तेज गति से हो रहा है। दिन रात यहां मशीनें काम कर रही हैं।
विज्ञापन
सीमा पर 10247 कनाल भूमि आबाद होने की उम्मीद
हीरानगर सेक्टर में तारबंदी के आगे करीब 10247 कनाल जमीन पर दशकों से खेती नहीं ही पाई है। अब उम्मीद जताई जा रही है कि यह जमीन आबाद होगी। हालांकि, किसानों का कहना है कि पाकिस्तान पर इतनी जल्दी भरोसा नहीं किया जा सकता। कुछ समय देखने के बाद ही तारबंदी के आगे के खेतों में जाना सही होगा। बीएसएफ ने पहले भी कई बार किसानों को तारबंदी के आगे खेती करने को कहा। यही नहीं मानियारी में पिछले साल प्रशासन ने बीएसएफ के सहयोग से तारबंदी के आगे 13 सौ कनाल जमीन पर गेंहू बोई, ताकि यहां किसानों को खेती करने के लिए आकर्षित किया जा सके।
विज्ञापन
पाकिस्तान की हर गतिविधि पर नजर बनाए हैं जवान
सीजफायर समझौते के बाद भी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सीमा सुरक्षा बल के जवान पूरी तरह से मुस्तैद हैं। पहले भी पाकिस्तान इस तरह के समझौते का उल्लंघन कर चुका है। इसलिए उस पर भरोसा करना आसान नहीं है। बीएसएफ की ओर से तारबंदी के पास उसी तरह से आज भी गश्त की जा रही है, जैसे सीजफायर समझौते से पहले की जाती थी। सीमा पार की हर गतिविधि पर बीएसएफ के जवान पैनी नजर बनाए हुए हैं।
बच्चे पढ़ाई के साथ खेल मैदान में भी मचा रहे धमाल
आईबी से मात्र कुछ दूरी पर लडवाल स्कूल में जो बच्चे पहले बंद कमरों में बैठकर पढ़ते थे। अब शांत माहौल में पढ़ाई कर रहे हैं और खेल मैदान में धमाल भी मचा रहे हैं। पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली मन्नू शर्मा ने कहा कि गोलाबारी के दौरान डर लगता था कि न जाने कब गोला स्कूल में गिर जाए। जब कभी गोलाबारी तेज हो जाती थी तो हम कई दिनों तक स्कूल भी नहीं आ पाते थे। स्कूल के शिक्षक कुलदीप राज ने बताया कि गोलाबारी के दौरान बच्चे सहम जाते थे। कई बार हम इनके परिवार वालों को कहते थे कि छोटे बच्चों को माहौल शांत होने तक स्कूल न भेजें। अब उम्मीद है कि स्कूल में बच्चों की संख्या भी बढ़ेगी।
समझौते से जिंदगी में आए कई बदलाव
बोबिया गांव के सुभाष सिंह ने बताया कि उनका गांव जीरो लाइन के पास है। कई बार पाकिस्तान ने गांव को निशाना बनाया है। सीजफायर समझौते के बाद करीब एक सप्ताह से गोलाबारी बंद है। हम घरों में चैन की नींद सो पा रहे हैं। बच्चे देर रात तक घर के आंगन में खेलते हैं। खेतों में चले जाएं, तो आने में शाम भी हो जाए तो भी घरवाले ज्यादा चिंतित नहीं होते हैं।
पहले खेत से लौटने तक अटकी रहती थीं सांसें
जगदीप सिंह ने कहा कि खेतों में काम करने तो पहले भी जाते थे। अब भी जा रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले हर वक्त गोलाबारी का डर रहता था। घर लौटने तक बीवी बच्चों की सांसें अटकी रहती थीं। अब हम अपनी मर्जी से जब चाहें खेत जा रहे हैं। पशुओं के लिए चारे का इंतजाम भी सही ढंग से हो रहा है। पहले सब काम निपटाने के बाद शाम ढलते ही घरों में दुबक जाते थे। अब खेतों में काम करने के बाद शाम को कुछ समय के लिए गली में गांव के लोगों के साथ गपशप भी मार लेते हैं। (संवाद)

तारबंदी के नजदीक खेतों में छिडकाव करता किसान।- फोटो : KATHUA