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Kathua News: जीवन-मरण के बंधन से मुक्त कराती है श्रीमद्भगवत कथा
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-कस्बे के आदर्श विद्या निकेतन स्कूल में श्रीमद्भागवत कथा
संवाद न्यूज एजेंसी
महानपुर। कस्बे के आदर्श विद्या निकेतन स्कूल में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन जारी है। बुधवार को कथा के दूसरे दिन कथावाचक आचार्य राज भूषण शास्त्री ने भागवत ज्ञान से धर्म के अर्थ की व्याख्या की। उन्होंने श्रद्धालुओं को ईश्वर के श्री चरणों से निष्काम प्रेम करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवत कथा जीवन-मरण के बंधन से मुक्त कराती है।
उन्होंने भक्तों को बताया कि नारद जी को भगवान के चरणों से निस्वार्थ प्रेम था। इस कारण उन्हें भगवान का सानिध्य प्राप्त हुआ। यही उपदेश नारद जी ने महर्षि वेद व्यास को दिया। जब वह 17 पुराणों का अध्ययन करने के बाद संतोष न प्राप्त कर सके तो नारद जी ने उन्हें भागवत का विस्तार करने की प्रेरणा दी। शुक देव जी ने वेद व्यास जी से भागवत का ज्ञान प्राप्त किया। जब राजा परीक्षित को ऋंगी ऋषि ने 7 दिन के बाद तक्षक नाग के डसने से अकाल मृत्यु प्राप्त होने का श्राप दिया तो राजा अपनी मुक्ति का उपाय ढूंढने लगे। इस दौरान उन्होंने हजारों संतों से केवल एक ही प्रश्न किया कि जल्दी मरने वाले व्यक्ति को क्या करना चाहिए। जब उनके इस प्रश्न का कोई भी ऋषि उत्तर दे सका। तब शुक देव ने राजा परीक्षित को भागवत का उपदेश दिया और केवल 7 दिनों में ही राजा को जन्म मरण के बंधन से मुक्त कर दिया।
कथावाचक ने कहा कि मानव का जन्म 7 दिनों में होता है और मृत्यु भी 7 दिन के अंतर्गत होती है। जीवन में 7 दिनों का बहुत महत्व है। इस सात का अर्थ सत्य है और सत्य केवल परमात्मा है। इस संसार में रहने वाला मनुष्य जीवन में परमात्मा से नश्वर वस्तुओं को मांगता है और दुख भोगता है। श्रीमद्भागवत कथा सप्त सिद्धि परमात्मा से परमात्मा को ही मांगने का अर्थात भक्ति का उपदेश देती है। क्योंकि, इसी से सभी जीवों का कल्याण है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
महानपुर। कस्बे के आदर्श विद्या निकेतन स्कूल में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन जारी है। बुधवार को कथा के दूसरे दिन कथावाचक आचार्य राज भूषण शास्त्री ने भागवत ज्ञान से धर्म के अर्थ की व्याख्या की। उन्होंने श्रद्धालुओं को ईश्वर के श्री चरणों से निष्काम प्रेम करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवत कथा जीवन-मरण के बंधन से मुक्त कराती है।
उन्होंने भक्तों को बताया कि नारद जी को भगवान के चरणों से निस्वार्थ प्रेम था। इस कारण उन्हें भगवान का सानिध्य प्राप्त हुआ। यही उपदेश नारद जी ने महर्षि वेद व्यास को दिया। जब वह 17 पुराणों का अध्ययन करने के बाद संतोष न प्राप्त कर सके तो नारद जी ने उन्हें भागवत का विस्तार करने की प्रेरणा दी। शुक देव जी ने वेद व्यास जी से भागवत का ज्ञान प्राप्त किया। जब राजा परीक्षित को ऋंगी ऋषि ने 7 दिन के बाद तक्षक नाग के डसने से अकाल मृत्यु प्राप्त होने का श्राप दिया तो राजा अपनी मुक्ति का उपाय ढूंढने लगे। इस दौरान उन्होंने हजारों संतों से केवल एक ही प्रश्न किया कि जल्दी मरने वाले व्यक्ति को क्या करना चाहिए। जब उनके इस प्रश्न का कोई भी ऋषि उत्तर दे सका। तब शुक देव ने राजा परीक्षित को भागवत का उपदेश दिया और केवल 7 दिनों में ही राजा को जन्म मरण के बंधन से मुक्त कर दिया।
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कथावाचक ने कहा कि मानव का जन्म 7 दिनों में होता है और मृत्यु भी 7 दिन के अंतर्गत होती है। जीवन में 7 दिनों का बहुत महत्व है। इस सात का अर्थ सत्य है और सत्य केवल परमात्मा है। इस संसार में रहने वाला मनुष्य जीवन में परमात्मा से नश्वर वस्तुओं को मांगता है और दुख भोगता है। श्रीमद्भागवत कथा सप्त सिद्धि परमात्मा से परमात्मा को ही मांगने का अर्थात भक्ति का उपदेश देती है। क्योंकि, इसी से सभी जीवों का कल्याण है।
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