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संत महापुरुषों के ज्ञानोपदेश का नाम ही है सत्संग
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कथा का श्रवण करते श्रद्धालु, संवाद।
- फोटो : KATHUA
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कठुआ। नगरी स्थित माता बाला सुंदरी के मंदिर में जारी श्रीमद्भागवत कथा का सोमवार को समापन हो गया है। इस मौके पर मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। जिसमें हजारों भक्तों ने प्रसाद पाया। साथ ही संत सुभाष शास्त्री के प्रवचन सुने।
कथा के अंतिम दिन शास्त्री जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को सत्संग का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि सत्संग का अर्थ है कि जो मानव को सत्य के संग कर सके। और, संसार में सत्य परमात्मा और आत्मा है। सत्य हमारा अस्तित्व और स्वरूप है। जब सत्य मैं ही हूं तो मैं किसका संग करूं? सत्य का संग तो सदा से है। सत्य कभी मुझसे अलग होता ही नहीं। सत्य के बिना हम हो ही नहीं सकते, और सत्य के बिना हम रह भी नहीं सकते।
भावार्थ समझाते हुए कथावाचक ने कहा कि सत्य हमारा जीवन है। जन्म की मृत्यु होती है, परंतु जीवन की मृत्यु नहीं होती। सत्य में ही सब कुछ होता है, फिर शेष सत्य ही रहता है। सत्य के बिना कुछ नहीं होता है। जिस प्रकार बिना जल के कोई लहर नहीं होती, बिना मिट्टी के कोई घड़ा नहीं होता और सोने के बिना कोई स्वर्ण आभूषण नहीं होता है। ठीक उसी प्रकार सत्य के बिना जगत में कुछ भी नहीं होता। सत्य पर दृढ़ विश्वास रखने वालों का भी कुछ नहीं बिगड़ता।
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उन्होंने कहा कि सत्य हमारा कभी साथ नहीं छोड़ता। कहने का अर्थ यह है कि जिस सत्य का संग सदैव है, उस सत्य का संग क्या करवाएंगे। वास्तव में देखा जाए तो संत महापुरुषों की संगति का नाम ही सत्संग है। अर्थात्, मुख्य रूप से संत महापुरुषों के ज्ञानोपदेश का नाम ही सत्संग है। इस बात को भली-भांति समझ लें कि संत महापुरुषों के उपदेश से सबका हित ही होता है। इसलिए, हमें सत्संग अवश्य करना चाहिए। इसी में हमारा कल्याण निहित है।
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कथा के अंतिम दिन शास्त्री जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को सत्संग का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि सत्संग का अर्थ है कि जो मानव को सत्य के संग कर सके। और, संसार में सत्य परमात्मा और आत्मा है। सत्य हमारा अस्तित्व और स्वरूप है। जब सत्य मैं ही हूं तो मैं किसका संग करूं? सत्य का संग तो सदा से है। सत्य कभी मुझसे अलग होता ही नहीं। सत्य के बिना हम हो ही नहीं सकते, और सत्य के बिना हम रह भी नहीं सकते।
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भावार्थ समझाते हुए कथावाचक ने कहा कि सत्य हमारा जीवन है। जन्म की मृत्यु होती है, परंतु जीवन की मृत्यु नहीं होती। सत्य में ही सब कुछ होता है, फिर शेष सत्य ही रहता है। सत्य के बिना कुछ नहीं होता है। जिस प्रकार बिना जल के कोई लहर नहीं होती, बिना मिट्टी के कोई घड़ा नहीं होता और सोने के बिना कोई स्वर्ण आभूषण नहीं होता है। ठीक उसी प्रकार सत्य के बिना जगत में कुछ भी नहीं होता। सत्य पर दृढ़ विश्वास रखने वालों का भी कुछ नहीं बिगड़ता।
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उन्होंने कहा कि सत्य हमारा कभी साथ नहीं छोड़ता। कहने का अर्थ यह है कि जिस सत्य का संग सदैव है, उस सत्य का संग क्या करवाएंगे। वास्तव में देखा जाए तो संत महापुरुषों की संगति का नाम ही सत्संग है। अर्थात्, मुख्य रूप से संत महापुरुषों के ज्ञानोपदेश का नाम ही सत्संग है। इस बात को भली-भांति समझ लें कि संत महापुरुषों के उपदेश से सबका हित ही होता है। इसलिए, हमें सत्संग अवश्य करना चाहिए। इसी में हमारा कल्याण निहित है।

नगरी के माता बाला सुंदरी मंदिर में श्रीमद् भागवत कथा सुनाते संत सुभाष शास्त्री, संवाद।- फोटो : KATHUA