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जीवन में मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग है सत्संग
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नगरी में श्रीमद् भगवत कथा के दौरान प्रवचन करते संत सुभाष शास्त्री, संवाद।
- फोटो : KATHUA
कठुआ। नगरी स्थित माता बाला सुंदरी मंदिर प्रांगण में श्रीमद्भागवत कथा जारी है। बुधवार को कथावाचक संत सुभाष शास्त्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं पर अपने प्रवचनों की अमृत वर्षा करते हुए उन्हें सत्संग का महत्व समझाया।
उन्होंने कहा कि सत्संग का अर्थ सत्य को साथ करना है। इसके विपरीत कुसंग एक जहर है। इसमें जो पड़ता है, उसका धीरे-धीरे सब कुछ खत्म हो जाता है। कुसंग से वर्तमान तो बिगड़ता ही है, भविष्य भी खराब होता है। इसलिए, कुसंग को जहर जानें और हमेशा भयभीत रहें। साथ ही जीवन में सत्य के संग को अपनाएं। क्योंकि, सत्संग से सजगता उपजती है।
कथावाचक ने कहा कि जो भीतर से सजग है, वह संसारी होते हुए भी संयासी है। और, जो भीतर से सजग नहीं है, वह संयासी होते हुए भी संसारी है। अर्थात्, हमारी सजगता का नाम ही संयास है। जैसे चुंबक लोहे को खींचता है, वैसे ही संयास सत्य को खींचता है। संयास का अर्थ यह कदापि नहीं है कि घर बार छोड़ने वाला ही संयासी होता है। असल में जो संसार में रहकर गृहस्थ जीवन का पालन करने के साथ सत्य के मार्ग पर चलता है, वही धर्म की दृष्टि से सच्चा संयासी है।
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शास्त्री जी ने बताया कि कुसंग से बचते हुए हमेशा सत्य के साथ रहना चाहिए। इसी में हमारा कल्याण है। आप सोने से जब भी, जैसा भी आभूषण बनवा लें, सोना उस आभूषण का साथ कभी नहीं छोड़ता। उसी प्रकार हमें सत्य का संग नहीं छोड़ना है। इस मानव तन में सतगुरु के सत्संग को धारण कर जीव को अपने अविनाशी सत्य स्वरूप का बोध करना चाहिए। ताकि, वह जन्म और मृत्यु के चक्र से छूट सके। कथा के अंत में श्रद्धालुओं ने सामूहिक आरती का आयोजन किया।
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उन्होंने कहा कि सत्संग का अर्थ सत्य को साथ करना है। इसके विपरीत कुसंग एक जहर है। इसमें जो पड़ता है, उसका धीरे-धीरे सब कुछ खत्म हो जाता है। कुसंग से वर्तमान तो बिगड़ता ही है, भविष्य भी खराब होता है। इसलिए, कुसंग को जहर जानें और हमेशा भयभीत रहें। साथ ही जीवन में सत्य के संग को अपनाएं। क्योंकि, सत्संग से सजगता उपजती है।
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कथावाचक ने कहा कि जो भीतर से सजग है, वह संसारी होते हुए भी संयासी है। और, जो भीतर से सजग नहीं है, वह संयासी होते हुए भी संसारी है। अर्थात्, हमारी सजगता का नाम ही संयास है। जैसे चुंबक लोहे को खींचता है, वैसे ही संयास सत्य को खींचता है। संयास का अर्थ यह कदापि नहीं है कि घर बार छोड़ने वाला ही संयासी होता है। असल में जो संसार में रहकर गृहस्थ जीवन का पालन करने के साथ सत्य के मार्ग पर चलता है, वही धर्म की दृष्टि से सच्चा संयासी है।
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शास्त्री जी ने बताया कि कुसंग से बचते हुए हमेशा सत्य के साथ रहना चाहिए। इसी में हमारा कल्याण है। आप सोने से जब भी, जैसा भी आभूषण बनवा लें, सोना उस आभूषण का साथ कभी नहीं छोड़ता। उसी प्रकार हमें सत्य का संग नहीं छोड़ना है। इस मानव तन में सतगुरु के सत्संग को धारण कर जीव को अपने अविनाशी सत्य स्वरूप का बोध करना चाहिए। ताकि, वह जन्म और मृत्यु के चक्र से छूट सके। कथा के अंत में श्रद्धालुओं ने सामूहिक आरती का आयोजन किया।

कथा के दौरान आरती में भाग लेते श्रद्धालु, संवाद।- फोटो : KATHUA