{"_id":"687d49352bc7fc73fb0f1d04","slug":"kathua-news-market-news-kathua-news-c-10-1-jmu1038-665971-2025-07-21","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kathua News: सिमट रहा ओखली का बाजार<bha>;<\/bha> पहले 40 परिवार थे सक्रिय, अब एक बचा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kathua News: सिमट रहा ओखली का बाजार<bha>;</bha> पहले 40 परिवार थे सक्रिय, अब एक बचा
Mon, 21 Jul 2025 01:23 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Mon, 21 Jul 2025 01:23 AM IST
विज्ञापन
पत्थर को तराश कर ओखली बनाने में लगे गोविंदसर निवासी लेखराज। संवाद
लखनपुर दाल-बड़े वालों के अलावा अमृतसर तक भी कठुआ के पत्थरों से बनी ओखली की मांग
कठुआ। पत्थर की ओखली का बाजार लगातार सिमटता जा रहा है। रसोई घर में इसकी जगह लकड़ी, पीतल और लोहे की बनी ओखली ने ले ली है।
बिजली से चलने वाले कई तरह के मिक्सर ग्राइंडर वर्तमान में बाजार में उपलब्ध हैं। मगर इसके बावजूद एक परिवार ऐसा है जिसने अपनी परंपरा को जिंदा रखा है और आजीविका भी चला रहा है। कभी कठुआ शहर और आसपास के दर्जनों गांव की ओखलियों (कुंड़ा) सहित छोटी चक्की, कुल देवी-देवताओं के मोहरें आदि की मांग को पूरा गोविंदसर के रहने वाले 40 परिवार किया करते थे।
धीरे-धीरे बाजार में कम होती मांग के साथ ज्यादातर परिवारों ने पत्थर को तराशने के हुनर को छोड़ अन्य काम शुरू कर दिया। लेकिन 60 वर्षीय लेख राज आज भी अपने बुजुर्गों की परंपरा को समेटे हुए है।
उनके बनाए हुए ओखली आज भी जम्मू-कश्मीर के प्रवेशद्वार लखनपुर में दाल बड़े बनाने वालों की पहली पसंद है। पंजाब के कई शहरों अमृतसर और जलंधर के लोग उनसे आर्डर पर बड़े से बड़ा ओखली बनाते है। जिसमें एक बार ही तीन से चार किलोग्राम दाल की पिसाई हो सकती है। लेख राज ने बताया कि गोविंदसर में उनका एक पूरा मोहल्ला था।
विज्ञापन
जिसे लोग बटेड़ा मोहल्ला (पत्थर का काम करने वाले) के नाम से जानते थे। उनका कहना है कि उसने यह हुनर अपने पिता से सिखा था। पुरानी पीढ़ी खत्म हो गई और नई पीढ़ी ने आगे इसे सिखा नहीं, जिसकी बजह बाजार में इसकी लगातार कम होती मांग है।
मौजूदा समय में ओखली बनाने में आ रही कई तरह की चुनौतियां
लेख राज का मानना है कि वर्तमान में एक तो इसका बाजार सिमटता जा रहा है। सिर्फ दाल-बड़े का काम करने वाले ही इसका इस्तेमाल करते हैं। पत्थर की मजबूत ओखली की उमर दशकों में होती है। लिहाजा जो एक बार खरीदता है उसे कई सालों तक खरीदने की जरूरत महसूस नहीं होती। वहीं, दूसरी और आसपास के दरियों में इसके पत्थर मिलना कम हो गया है। क्योंकि ज्यादातर दरियों में बड़ी मात्रा में खनन होने से विशेष तरह के पत्थर नहीं मिल पा रहे हैं। उन्होंने बताया कि तीन से चार किलो दाल की पिसाई करने वाली ओखली के लिए कम से कम डेढ़ क्विंटल के पत्थर की जरूरत पड़ती है। इसे ढूंढने के लिए दरिया के बीच कई बार 15 से 20 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। अगर विशेष पत्थर मिल भी जाए तो उससे घर तक पहुंचाना मुश्किल होता है। पहले कई दिनों तक उसे दरिया में ही तराशना पड़ता है और बाद में ऑटों की मदद से घर तक पहुंचाया जाता है। लगभग दो सप्ताह की कड़ी मेहनत के बाद एक बड़ी ओखली बनती है। इसकी कीमत बाजार में तीन से चार हजार के बीच होती है।
विज्ञापन
कठुआ। पत्थर की ओखली का बाजार लगातार सिमटता जा रहा है। रसोई घर में इसकी जगह लकड़ी, पीतल और लोहे की बनी ओखली ने ले ली है।
बिजली से चलने वाले कई तरह के मिक्सर ग्राइंडर वर्तमान में बाजार में उपलब्ध हैं। मगर इसके बावजूद एक परिवार ऐसा है जिसने अपनी परंपरा को जिंदा रखा है और आजीविका भी चला रहा है। कभी कठुआ शहर और आसपास के दर्जनों गांव की ओखलियों (कुंड़ा) सहित छोटी चक्की, कुल देवी-देवताओं के मोहरें आदि की मांग को पूरा गोविंदसर के रहने वाले 40 परिवार किया करते थे।
धीरे-धीरे बाजार में कम होती मांग के साथ ज्यादातर परिवारों ने पत्थर को तराशने के हुनर को छोड़ अन्य काम शुरू कर दिया। लेकिन 60 वर्षीय लेख राज आज भी अपने बुजुर्गों की परंपरा को समेटे हुए है।
विज्ञापन
उनके बनाए हुए ओखली आज भी जम्मू-कश्मीर के प्रवेशद्वार लखनपुर में दाल बड़े बनाने वालों की पहली पसंद है। पंजाब के कई शहरों अमृतसर और जलंधर के लोग उनसे आर्डर पर बड़े से बड़ा ओखली बनाते है। जिसमें एक बार ही तीन से चार किलोग्राम दाल की पिसाई हो सकती है। लेख राज ने बताया कि गोविंदसर में उनका एक पूरा मोहल्ला था।
विज्ञापन
जिसे लोग बटेड़ा मोहल्ला (पत्थर का काम करने वाले) के नाम से जानते थे। उनका कहना है कि उसने यह हुनर अपने पिता से सिखा था। पुरानी पीढ़ी खत्म हो गई और नई पीढ़ी ने आगे इसे सिखा नहीं, जिसकी बजह बाजार में इसकी लगातार कम होती मांग है।
मौजूदा समय में ओखली बनाने में आ रही कई तरह की चुनौतियां
लेख राज का मानना है कि वर्तमान में एक तो इसका बाजार सिमटता जा रहा है। सिर्फ दाल-बड़े का काम करने वाले ही इसका इस्तेमाल करते हैं। पत्थर की मजबूत ओखली की उमर दशकों में होती है। लिहाजा जो एक बार खरीदता है उसे कई सालों तक खरीदने की जरूरत महसूस नहीं होती। वहीं, दूसरी और आसपास के दरियों में इसके पत्थर मिलना कम हो गया है। क्योंकि ज्यादातर दरियों में बड़ी मात्रा में खनन होने से विशेष तरह के पत्थर नहीं मिल पा रहे हैं। उन्होंने बताया कि तीन से चार किलो दाल की पिसाई करने वाली ओखली के लिए कम से कम डेढ़ क्विंटल के पत्थर की जरूरत पड़ती है। इसे ढूंढने के लिए दरिया के बीच कई बार 15 से 20 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। अगर विशेष पत्थर मिल भी जाए तो उससे घर तक पहुंचाना मुश्किल होता है। पहले कई दिनों तक उसे दरिया में ही तराशना पड़ता है और बाद में ऑटों की मदद से घर तक पहुंचाया जाता है। लगभग दो सप्ताह की कड़ी मेहनत के बाद एक बड़ी ओखली बनती है। इसकी कीमत बाजार में तीन से चार हजार के बीच होती है।