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नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की
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कठुआ। शहर के वार्ड 8 में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन जारी है। चौथे दिन की कथा के दौरान कथावाचक महंत महेश दास शास्त्री ने भगवान श्री कृष्ण जन्म का प्रसंग सुनाते हुए धरती पर उनके अवतरण का महत्व बताया। वहीं कथा के दौरान भगवान के बाल रूप की झांकी भी प्रस्तुत की गई, जिसे देखते ही उपस्थित श्रद्धालु उत्साह से भर गए और अपने स्थान पर खड़े होकर भगवान का जयघोष कर उनका स्वागत किया। वहीं, कथा में नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल के जैसे भजनों पर महिलाएं नाचने लगीं।
कथावाचक ने बताया कि कंस के अत्याचारों से त्रस्त मथुरा वासियों की पुकार सुनकर देवकी के आठवें पुत्र के रूप में भगवान श्री हरि ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया, जिन्होंने कंस को मारकर माता-पिता को कारागार से मुक्त कराया और नाना को मथुरा के सिंहासन सौंप दिया।
कथा में कहा कि वासुदेव-देवकी मथुरा वासियों को दुराचारी कंस के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान कृृष्ण ने जन्म लिया। भगवान श्रीकृष्ण का अवतार जीव को जीव से प्रेम करना सिखाता है। कृष्ण ने कई लीलाओं के माध्यम से लोगों को संदेश दिए हैं। इन लीलाओं का सार समझने वाला व्यक्ति सदैव जीवन में सुखी रहता है।
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जीव तभी मुक्ति पा सकता है जब वो भागवत कथा का श्रवण करें। कहा कि जीव को आत्मा की शांति के लिए प्रभु की शरण में जाने की इच्छा रहती है, लेकिन मनुष्य में व्याप्त, तृष्णा, लोभ, पाप जैसी जैसी कई प्रवृत्तियां उसे प्रभु की शरण से दूर करती हैं। जीव तभी मुक्ति पा सकता है, जब वो भागवत कथा का श्रवण करें।
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कथावाचक ने बताया कि कंस के अत्याचारों से त्रस्त मथुरा वासियों की पुकार सुनकर देवकी के आठवें पुत्र के रूप में भगवान श्री हरि ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया, जिन्होंने कंस को मारकर माता-पिता को कारागार से मुक्त कराया और नाना को मथुरा के सिंहासन सौंप दिया।
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कथा में कहा कि वासुदेव-देवकी मथुरा वासियों को दुराचारी कंस के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान कृृष्ण ने जन्म लिया। भगवान श्रीकृष्ण का अवतार जीव को जीव से प्रेम करना सिखाता है। कृष्ण ने कई लीलाओं के माध्यम से लोगों को संदेश दिए हैं। इन लीलाओं का सार समझने वाला व्यक्ति सदैव जीवन में सुखी रहता है।
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जीव तभी मुक्ति पा सकता है जब वो भागवत कथा का श्रवण करें। कहा कि जीव को आत्मा की शांति के लिए प्रभु की शरण में जाने की इच्छा रहती है, लेकिन मनुष्य में व्याप्त, तृष्णा, लोभ, पाप जैसी जैसी कई प्रवृत्तियां उसे प्रभु की शरण से दूर करती हैं। जीव तभी मुक्ति पा सकता है, जब वो भागवत कथा का श्रवण करें।