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Kathua News: भगवान शिव और माता सती का प्रसंग सुनाया
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कठुआ। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से शहर के वार्ड 19 शिवानगर के बड़ा शिव मंदिर में शिवकथा का आयोजन जारी है। तीन दिवसीय कथा के दूसरे दिन आशुतोष महाराज के शिष्य स्वामी विकासानंद ने भगवान शिव और माता सती का प्रसंग सुनाया।
उन्होंने बताया कि किस प्रकार से माता सती भगवान शिव का कहना न मानकर दक्ष की यज्ञशाला में अपने पति का अपमान सहन न कर अपने शरीर का परित्याग कर देती हैं और फिर अगला जन्म हिमालय के घर में पुत्री के रूप में जन्म लेती हैं। हिमालय नगर में पुत्री के जन्म पर बहुत ही धूमधाम से उत्सव मनाया जासा है।
स्वामी विकासानंद ने कहा कि वर्तमान समय में लोगों के दिल में पुत्र और पुत्री में भेदभाव की भावना जन्म लेती है। अभी भी हमारे समाज में कन्या भ्रूण हत्या जैसा पाप होता रहता है। लोग बेटी को बोझ समझते हैं लेकिन हमारे महापुरुष हमें समझातेे हुए कहते हैं कि पुत्री कोई बोझ नहीं है। नारी जननी है, जिसने ऐसे ऐसे भक्तों को जन्म दिया है, जिन्होंने समाज में अपना नाम रोशन किया। बहुत लोग कहते हैं कि यदि पुत्र नहीं होगा तो हमारा अंत में कल्याण नहीं होगा, जबकि शास्त्रों में कहा गया है कि पुत्र होने या न होने से कल्याण नहीं होता, बल्कि यदि जीवन में ज्ञान नहीं तो व्यक्ति का उद्धार नहीं हो सकता है। ज्ञान का अर्थ ईश्वर को तत्व स्वरूप से जानना है। इसके लिए जीवन में परम आवश्यकता सद्गुरु की होती है। सद्गुरु के आगमन के बाद ही व्यक्ति अपने घट में ईश्वर के ब्रह्म स्वरूप का दर्शन करता है।
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उन्होंने बताया कि किस प्रकार से माता सती भगवान शिव का कहना न मानकर दक्ष की यज्ञशाला में अपने पति का अपमान सहन न कर अपने शरीर का परित्याग कर देती हैं और फिर अगला जन्म हिमालय के घर में पुत्री के रूप में जन्म लेती हैं। हिमालय नगर में पुत्री के जन्म पर बहुत ही धूमधाम से उत्सव मनाया जासा है।
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स्वामी विकासानंद ने कहा कि वर्तमान समय में लोगों के दिल में पुत्र और पुत्री में भेदभाव की भावना जन्म लेती है। अभी भी हमारे समाज में कन्या भ्रूण हत्या जैसा पाप होता रहता है। लोग बेटी को बोझ समझते हैं लेकिन हमारे महापुरुष हमें समझातेे हुए कहते हैं कि पुत्री कोई बोझ नहीं है। नारी जननी है, जिसने ऐसे ऐसे भक्तों को जन्म दिया है, जिन्होंने समाज में अपना नाम रोशन किया। बहुत लोग कहते हैं कि यदि पुत्र नहीं होगा तो हमारा अंत में कल्याण नहीं होगा, जबकि शास्त्रों में कहा गया है कि पुत्र होने या न होने से कल्याण नहीं होता, बल्कि यदि जीवन में ज्ञान नहीं तो व्यक्ति का उद्धार नहीं हो सकता है। ज्ञान का अर्थ ईश्वर को तत्व स्वरूप से जानना है। इसके लिए जीवन में परम आवश्यकता सद्गुरु की होती है। सद्गुरु के आगमन के बाद ही व्यक्ति अपने घट में ईश्वर के ब्रह्म स्वरूप का दर्शन करता है।
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