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Kathua News: 80 फीसदी दृष्टिहीन राहुल पढ़-लिख कर बना दिव्यांगों के लिए मिसाल
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राहुल कुमार।
- अंतरराष्ट्रीय विकलांगता दिवस पर विशेष
-चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से एमए हिंदी की डिग्री प्राप्त की, मौसी ने पढ़ाई के लिए किया प्रेरित, खर्चा भी उठाया
- अब सरकारी मदद की देख रहा राह
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। 80 फीसदी दृष्टिहीन राहुल कुमार सैकड़ों दिव्यांगों के लिए प्रेरणास्रोत बनकर उभरा है। साल भर पहले चंड़ीगढ़ विश्वविद्यालय से एमए हिंदी की डिग्री हासिल करने वाले राहुल की मुश्किलों से भरी यात्रा न केवल उसके संघर्ष को दर्शाती है, बल्कि युवाओं को बूढ़े मां-बाप का सहारा बनने के लिए भी प्रेरित करती है।
राहुल के अनुसार उसके पिता दर्जी हैं। आय कम होने के चलते 12वीं के बाद पढ़ाई करना मुश्किल हो गया था। लेकिन मौसी त्रिशला ने हाथ बढ़ाया और एमए तक की शिक्षा पूरी करवाई। अब नौकरी पाने के लिए वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। बूढ़े मां-बाप से घर में मेरा और दो बहनों का गुजर बसर अब मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में वो सरकार से मदद की उम्मीद लगाए हुए है। यह उम्मीद केवल राहुल की ही नहीं बल्कि इसके जैसे उन हजारों दृष्टिहीनों की है जो समाज की मुख्य धारा में जगह बनाना चाहते हैं। राहुल की मां नीशा देवी 10 भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। मायके में तीन दृष्टिहीन भाइयों का भार ढोने के बाद जब उसका विवाह शहर के वार्ड 12 में मनोहर लाल से हुआ तो उसकी पहली संतान भी नेत्रहीन पैदा हुई। उसने कभी भी नहीं सोचा था कि उसका दृष्टिहीन बेटा राहुल भविष्य में उसका सहारा बन पाएगा।
नीशा देवी की बड़ी बहन त्रिशला देवी स्वास्थ्य विभाग में बतौर नर्स मेडिकल कॉलेज जम्मू में कार्यरत थी। उसके कहने पर राहुल को जिला समाज कल्याण विभाग की मदद से
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दृष्टिहीन स्कूल रूपनगर जम्मू भेज दिया गया। जहां से राहुल ने 12वीं तक पढ़ाई की। जिसके बाद वर्ष 2019 में स्नातक की डिग्री लेने के लिए अपनी मौसी की मदद से चंडीगढ़ विश्वविद्यालय के आरएसडी कॉलेज में दाखिल लिया और पिछले वर्ष एमए की डिग्री लेकर एक बार फिर अपने घर कठुआ लौट आया है।
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-चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से एमए हिंदी की डिग्री प्राप्त की, मौसी ने पढ़ाई के लिए किया प्रेरित, खर्चा भी उठाया
- अब सरकारी मदद की देख रहा राह
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। 80 फीसदी दृष्टिहीन राहुल कुमार सैकड़ों दिव्यांगों के लिए प्रेरणास्रोत बनकर उभरा है। साल भर पहले चंड़ीगढ़ विश्वविद्यालय से एमए हिंदी की डिग्री हासिल करने वाले राहुल की मुश्किलों से भरी यात्रा न केवल उसके संघर्ष को दर्शाती है, बल्कि युवाओं को बूढ़े मां-बाप का सहारा बनने के लिए भी प्रेरित करती है।
राहुल के अनुसार उसके पिता दर्जी हैं। आय कम होने के चलते 12वीं के बाद पढ़ाई करना मुश्किल हो गया था। लेकिन मौसी त्रिशला ने हाथ बढ़ाया और एमए तक की शिक्षा पूरी करवाई। अब नौकरी पाने के लिए वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। बूढ़े मां-बाप से घर में मेरा और दो बहनों का गुजर बसर अब मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में वो सरकार से मदद की उम्मीद लगाए हुए है। यह उम्मीद केवल राहुल की ही नहीं बल्कि इसके जैसे उन हजारों दृष्टिहीनों की है जो समाज की मुख्य धारा में जगह बनाना चाहते हैं। राहुल की मां नीशा देवी 10 भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। मायके में तीन दृष्टिहीन भाइयों का भार ढोने के बाद जब उसका विवाह शहर के वार्ड 12 में मनोहर लाल से हुआ तो उसकी पहली संतान भी नेत्रहीन पैदा हुई। उसने कभी भी नहीं सोचा था कि उसका दृष्टिहीन बेटा राहुल भविष्य में उसका सहारा बन पाएगा।
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नीशा देवी की बड़ी बहन त्रिशला देवी स्वास्थ्य विभाग में बतौर नर्स मेडिकल कॉलेज जम्मू में कार्यरत थी। उसके कहने पर राहुल को जिला समाज कल्याण विभाग की मदद से
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दृष्टिहीन स्कूल रूपनगर जम्मू भेज दिया गया। जहां से राहुल ने 12वीं तक पढ़ाई की। जिसके बाद वर्ष 2019 में स्नातक की डिग्री लेने के लिए अपनी मौसी की मदद से चंडीगढ़ विश्वविद्यालय के आरएसडी कॉलेज में दाखिल लिया और पिछले वर्ष एमए की डिग्री लेकर एक बार फिर अपने घर कठुआ लौट आया है।