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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Amrit Mahotsav of Azadi: The village of Brigadier Rajinder Singh, the protector of Jammu and Kashmir, yearns for respect

आजादी का अमृत महोत्सव: सम्मान को तरसा जम्मू-कश्मीर के रक्षक ब्रिगेडियर राजिंद्र सिंह का गांव

Wed, 25 Aug 2021 02:36 PM IST
करिश्मा चिब प्रीत चौधरी, सांबा
प्रीत चौधरी, सांबा Published by: करिश्मा चिब Updated Wed, 25 Aug 2021 02:36 PM IST
सार

आजादी के अमृत महोत्सव की बेला पर बगूना के ग्रामीणों को टीस दे रही शहीद की अनदेखी।

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Amrit Mahotsav of Azadi: The village of Brigadier Rajinder Singh, the protector of Jammu and Kashmir, yearns for respect
आजादी का अमृत महोत्सव - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पाकिस्तानी कबायली हमले के दौरान जिस रणबांकुरेे ने जम्मू-कश्मीर की रक्षा करते प्राण न्योछावर कर दिए, उनका गांव सरकारी उदासीनता से उबर नहीं पाया है। आजादी के अमृत महोत्सव को धूमधाम से मनाया जा रहा है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के रक्षक कहे जाने वाले ब्रिगेडियर राजिंद्र सिंह के गांव बगूना के हालात नहीं बदल पाए हैं। ऐसे में शहीद की अनदेखी ग्रामीणों के लिए टीस बन गई है।  

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सांबा जिले में बिग्रेडियर राजिंद्र सिंह के पैतृक गांव बगूना को राजिंद्र सिंह पुरा नाम दिया गया है, लेकिन जमीनी हालात में सरकार की ओर से शहीद के नाम का सम्मान नजर नहीं आता। कुछ माह पूर्व उप राज्यपाल मनोज सिन्हा गांव में आयोजित कार्यक्रम में पहुंचे थे। लोगों ने एलजी को मांग पत्र सौंपा था, जिस पर अभी तक अमल नहीं हो पाया है। शहीद ब्रिगेडियर को सर्वोच्च वीरता पुरस्कार से लेकर अन्य सम्मान देने की मांग प्रदेश से लेकर केंद्र तक उठाई गई। इन मांगों पर कहीं से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं हो पाई है।
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बंटवारे के वक्त चीफ आफ मिलिट्री स्टाफ रहते खुद संभाले अग्रिम मोर्चे
शहीद ब्रिगेडियर राजिंद्र सिंह का जन्म 14 जून 1899 में बगूना गांव में हुआ। 14 जून 1921 को उन्हें सेना में कमीशन मिला। 14 मई 1942 में उन्हें ब्रिगेडियर बनाया गया। 24 सितंबर 1947 को वे चीफ आफ मिलिट्री स्टाफ बने। भारत-पाकिस्तान विभाजन होने पर पाकिस्तान के कबायलियों ने कश्मीर पर हमला बोला तो जम्मू-कश्मीर के सैन्य प्रमुख होने के नाते अग्रिम मोर्चे खुद संभालने पहुंच गए। केंद्र से सेनाएं भेजने में देरी के बीच ब्रिगेडियर राजिंद्र सिंह को जम्मू-कश्मीर सेना की कमान सौंपी गई थी।
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ब्रिगेडियर चंद सैनिकों को लेकर कबायलियों से मुकाबला करने के लिए सरहद पर पहुंच गए। 23 अक्तूबर 1947 को उड़ी में उन्होंने मुकाबला किया। 24 अक्टूूबर 1947 को उड़ी में दुश्मन को खदेड़ा। 25 अक्तूबर 1947 को मोहरा में दुश्मनों को भगाया। 26 अक्तूबर 1947 को रामपुर से दुश्मनों को खदेड़ा, 27 अक्तूबर 1947 को मंदिर में उन्होंने दुश्मनों को खदेड़ा। ब्रिगेडियर राजिंद्र सिंह ने महाराजा हरि सिंह को वचन दिया था कि आखिरी दम तक देश की सरहदों पर दुश्मन से लड़ूंगा। उन्होंने वैसा ही किया। 27 अक्तूबर को बारामुला जिले के बोनियार में दुश्मनों से लोहा लेते वे शहीद हो गए।

शहीद के घर की हालत जर्जर सम्मान की मांगें भी अनसुनी
शहीद ब्रिगेडियर राजिंद्र सिंह के घर की हालत जर्जर बनी हुई है। स्थानीय लोगों ने ब्रिगेडियर को भारत रत्न देने की मांग उठाई है। केंद्रीय विश्वविद्यालय में डोगरा इतिहास पढ़ाए जाने और संस्थान का नाम बिग्रेडियर राजेंद्र सिंह के नाम पर रखे जाने की मांग की गई। वर्ष 1999 में तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस को भी लोगों ने शहीद को परमवीर चक्र दिए जाने की मांग उठाई थी। स्थानीय लोगों के अनुसार शहीद के उचित सम्मान के लिए उठाई गई मांगाें की लगातार अनदेखी की जा रही है।

सेना ने घर को लाइब्रेरी बनाया कर्मी रिटायर, लटक गया ताला
राजेंद्र सिंह पुरा को वर्ष 2006 में मॉडल विलेज बनाया गया, लेकिन वैसी सुविधाएं नहीं दी गईं, जो मिलनी चाहिए थी। शहीद ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह के घर को सेना की ओर से लाइब्रेरी में बदला गया। एक कर्मचारी रखा गया जिसके सेवानिवृत्त होने के बाद से लाइब्रेरी बंद पड़ी है। प्राइमरी स्वास्थ्य केंद्र में भी सुविधाओं का टोटा है। पशुपालन विभाग का कार्यालय एक दुकान में चल रहा है।

राजेंद्र सरोवर के लिए 17 लाख रुपये फंड दिए जाने को कहा गया था, लेकिन सरोवर नहीं बन पाया है। खेल मैदान के लिए भी कई बार मांग उठाई गई कि ब्रिगेडियर के नाम पर मैदान बनाया जाए। महाराजा हरि सिंह के नाम पर मैदान है। सांसद जुगल किशोर शर्मा ने राजेंद्र सिंह पुरा में शहीद के नाम पर गेट बनाने के लिए 14 लाख फंड देने की घोषणा की। गत सात वर्ष से गेट नहीं बन पाया है। -परमवीर सिंह जमवाल रिंपु, स्थानीय निवासी एवं सामाजिक कार्यकर्ता

राजेंद्र सिंह पुरा में मांग उठाई थी कि आठवीं तक के सरकारी स्कूल का दर्जा बढ़ा कर दसवीं तक किया जाए, लेकिन अभी तक दर्जा नहीं बढ़ाया गया है। शहीद के गांव की सड़कों का भी बुरा हाल है। शहीद के नाम के लिए गेट बनाने की मांग उठाई गई थी उस पर कोई उचित कदम नहीं उठाया गया है। - ब्रिज पाल सिंह, स्थानीय सरपंच

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