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प्रेम संबंध : हत्या के दोषी पाए गए युवक को सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Sat, 10 Jun 2017 01:38 PM IST
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प्रेम संबंध के एक मामले में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा प्रेमी को प्रेमिका की हत्या का दोषी ठहराने के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने युवक को बरी कर दिया है। मामला एक नवंबर 1995 का है जब जयपुर की एक युवती ने अपने प्रेमी से शादी की अनुमति नहीं मिलने पर जहर खाकर खुदकुशी कर ली।
युवती एमबीए की छात्रा थी और घटना वाले दिन अपने घर से शाम साढ़े पांच बजे क्लास में जाने के लिए निकली। जब वो रात नौ बजे तक घर नहीं लौटी तो घरवालों को फिक्र हुई। रात दस बजे घरवालों को फोन पर सूचना मिली कि युवती एसएमएस अस्पताल जयपुर में भर्ती है। सूचना मिलने पर उसके परिजन अस्पताल पहुंचे जहां वह मृत पाई गई। युवती के माता—पिता ने अगले दिन जयपुर के गांधी नगर थाने में प्रेमी युवक सतीश निरंकारी के खिलाफ हत्या की एफआईआर दर्ज कराई। जयपुर के स्पेशल कोर्ट ने युवती की खुदकुशी की बात को नकारते हए प्रेमी युवक को हत्या का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा दी। आरोपी युवक ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 19 फरवरी 2007 को अपने फैसले में युवक को हत्या का दोषी माना।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि अभियोजन अभियुक्त के खिलाफ आरोप साबित नहीं कर पाया है। अभियोजन में कई किस्म के संदेह पैदा होते हैं जिसके आधार पर अभियुक्त को दोषमुक्त किया जाता है।
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युवती एमबीए की छात्रा थी और घटना वाले दिन अपने घर से शाम साढ़े पांच बजे क्लास में जाने के लिए निकली। जब वो रात नौ बजे तक घर नहीं लौटी तो घरवालों को फिक्र हुई। रात दस बजे घरवालों को फोन पर सूचना मिली कि युवती एसएमएस अस्पताल जयपुर में भर्ती है। सूचना मिलने पर उसके परिजन अस्पताल पहुंचे जहां वह मृत पाई गई। युवती के माता—पिता ने अगले दिन जयपुर के गांधी नगर थाने में प्रेमी युवक सतीश निरंकारी के खिलाफ हत्या की एफआईआर दर्ज कराई। जयपुर के स्पेशल कोर्ट ने युवती की खुदकुशी की बात को नकारते हए प्रेमी युवक को हत्या का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा दी। आरोपी युवक ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 19 फरवरी 2007 को अपने फैसले में युवक को हत्या का दोषी माना।
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इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि अभियोजन अभियुक्त के खिलाफ आरोप साबित नहीं कर पाया है। अभियोजन में कई किस्म के संदेह पैदा होते हैं जिसके आधार पर अभियुक्त को दोषमुक्त किया जाता है।
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