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यदि संशय हो तो साक्ष्यों के आधार पर करें दुष्कर्म पीड़िता के बयानों की जांच - HC

Mon, 20 Nov 2017 12:42 PM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर Updated Mon, 20 Nov 2017 12:42 PM IST
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rajasthan highcourt asked to review facts in rape cases for both parties
rape attempt
हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और सामुहिक दुष्कर्म के दर्ज होने वाले झूठे मामलों को लेकर बड़ी टिप्पणी की है और एक मामले में निचली अदालत से 10-10 साल की सजा पाने वाले दो भाइयों को बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि पीड़िता के बयानों में कुछ भी संशय पाया जाए, तो उसके बयानों को साक्ष्यों के आधार पर जांच की जानी चाहिए।
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राजस्थान हाईकोर्ट की एकल पीठ ने कहा है कि दुष्कर्म के प्रकरणों में पीड़िता के बयानों को अन्य साक्ष्यों के साथ जोड़कर देखने का कोई नियम नहीं है, लेकिन यदि आरोपी के साथ उसकी दुश्मनी, पीड़िता की सहमति, उसके बयानों में विरोधाभास और यदि मेडिकल जांच में दुष्कर्म नहीं पाया जाए, तो पीड़िता के बयानों के साथ-साथ अन्य साक्ष्य को कड़ी के रूप में जोड़ कर देखा जाना चाहिए।
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इसके साथ ही अदालत ने मामले में निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए अपिलार्थीयो को बरी कर दिया है। न्यायाधीश गोवर्धन बाढ़दार की एकलपीठ ने यह आदेश रमेश और सुरेश की ओर से दायर आपराधिक याचिका की सुनवाई कर करते हुए दिए।
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दुष्कर्म होने के डेढ़ महीने बाद हुआ था मामला दर्ज

rajasthan highcourt asked to review facts in rape cases for both parties
डेमो इमेज - फोटो : Internet
अधिवक्ता संदीप माहेश्वरी ने अदालत को बताया कि पीड़िता के पिता ने 16 नवंबर 2010 को अलवर के लक्ष्मणगढ़ अदालत में परिवाद पेश कर बताया कि 20 सितंबर 2010 को उसकी विवाहिता पुत्री का अपिलार्थी अपहरण कर ले गए। उन्होंने कई दिनों तक उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया और बाद में थाने के बाहर छोड़कर फरार हो गए। जिस पर निचली अदालत ने दोनों आरोपियों को दस-दस साल की सजा सुनाई।

अपील में कहा गया ही रिपोर्ट डेढ़ माह की  देरी से दर्ज हुई थी। इसके अलावा पीड़िता के बयानों में भी विरोधाभास है। पीड़िता के प्राइवेट पार्ट पर कोई चोट भी नहीं आई है। इसके अलावा नोटेरी और स्टाम्प वेंडर के बयानों से साफ है की आरोपी रमेश और पीड़िता के बीच विवाह को लेकर एग्रीमेंट भी हुआ था।

ऐसे में निचली अदालत के आदेश को रद्द किया जाए। जिस पर सुनवाई करते हुए  हाईकोर्ट ने आरोपियों को बरी करते हुए कहा की पीड़िता के बयानों को अन्य साक्ष्यों के साथ कड़ी के रूप में जोड़कर देखने का कोई नियम नहीं है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में दूसरे साक्ष्यों के साथ बयानों को कड़ी के रूप में जोड़कर देखा जाना चाहिए।
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