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रेगिस्तान के जहाज पर मंडरा रहे संकट के बादल जानिए क्यों

Sat, 28 Oct 2017 12:27 PM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर Updated Sat, 28 Oct 2017 12:27 PM IST
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pushkar fair witnessing the biggest fall in numbers of camel this year
पुष्कर मेले की तस्वीर
रेगिस्तान के जहाज यानी ऊंट पर इन दिनों संकट के गहरे बादल मंडरा रहे हैं और आने वाले समय में शायद भावी पीढ़ी को ऊंट को तस्वीरों में ही देख पाए। 
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 साल 2014 में राजस्थान के राज्य पशु घोषित किए जा चुके ऊंट की बिक्री पर पशुपालन विभाग ने कई तरह की बंदिशे लगा दी है। ऐसे में अब ऊंट राजस्थान के बाहरी राज्यों से बाहर नहीं जा सकता है। आज से शुरू हुए पुष्कर मेले में राजस्थान के पश्चिमी जिलों से ऊंट बेचने आए ऊंट पालकों की कई व्यथाएं सुनने को मिल रही है। 
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जानकारी के अनुसार पशुपालन विभाग द्वारा ऊंटो को लेकर बनाए गए सख्त कानून के तहत ऊंटो के परिवहन और उसे बाहरी राज्यों में बेचने पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया गया है। ऐसे में ऊंटपालकों के पास इस बार पुष्कर मेले में ग्राहकों की भारी कमी हो गई है। वहीं ऊंटपालकों को करीब करीब आधे दामों पर अपने ऊंट बेचने पड़ रहे हैं। 
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पहले पुष्कर मेले में उत्तर प्रदेश,हरियाणा और गुजरात तक से व्यापारी इनकी खरीद फरोख्तगी के लिए आया करते थे मगर अब इनकी बिक्री पर प्रतिबंध के चलते पशु मेले में ऊंट खरीदने वालों की संख्या काफी हद तक घट गई है। 

 

20 हजार से संख्या हुई 1 हजार

pushkar fair witnessing the biggest fall in numbers of camel this year
मेले में बिक्री के लिए पहुंचे ऊंट
किसी समय राजस्थान में यातायात और माल ढुलाई के लिए काम में आने वाले ऊंट की उपयोगिता आधुनिक जमाने में काफी कम हो गई है और अब ये सिर्फ पर्यटकों को कैमल सफारी कराने और थोड़ा बहुत माल ढुलाई के ही काम में आता है। बिक्री नहीं होने के कारण ऊंट पालक भी अब इनके प्रजनन को लेकर कोई रूचि नहीं दिखाते हैं ऐसे में अब इनपर विलुप्तता का भी खतरा बना हुआ है। 

जानकारी के अनुसार पुष्कर मेले की शान माने जाने वाले ऊंट एक समय में 20 हजार की संख्या में पश्चिमी राजस्थान के शहरों से यहां बिक्री के लिए आते थे। मगर इस साल करीब 1500 के करीब ऊंट ही बिक्री के लिए पहुंचे है।

पुष्कर में लगने वाले पशु मेले के आयोजकों की माने तो ऊंटो की संख्या में तेजी से गिरावट का ही नतीजा है कि इस मेले को देखने में राजस्थान के ग्रामीण इलाकों की भी रूचि घटने लगी है और यहां अब केवल ऊंटो को नुमाइश के तौर पर ही उपयोग में लिया जा रहा है। 
 
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