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जिसके लिए जिंदगीभर लड़ता रहा, मौत के बाद मिली वो नौकरी
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Thu, 13 Apr 2017 07:42 PM IST
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राजस्थान हाईकोर्ट ने हैड कांस्टेबल की 18 साल पहले सेवा समाप्ति को गलत मानते हुए बर्खास्तगी आदेशों को रद्द कर दिया है। हालांकि अब यह कांस्टेबल दुनिया में नहीं रहा।
न्यायाधीश एसपी शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश हैड कांस्टेबल प्रभुदयाल के वारिसों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। याचिका में अधिवक्ता विजय पाठक ने अदालत को बताया कि प्रभुदयाल दौसा के सलेमपुरा थाने में कार्यरत था।विभाग ने एक आरोपी को दुर्भावना से बचाने का आरोप लगाते हुए प्रभुदयाल को आरोप पत्र दिया और विभागीय जांच के बाद 1998 में सेवा से पृथक कर दिया। जिसकी विभागीय अपील भी 1999 में खारिज कर दी गई। जिसे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा गया कि जांच अधिकारी ने जांच रिपोर्ट में माना था कि प्रभुदयाल पर लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए।
इसके बावजूद तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक के प्रभाव के कारण उसकी सेवा समाप्त कर दी गई। उसे दंड देने से पहले अनुशासनिक अधिकारी की ओर से लेटर ऑफ डिसएग्रीमेंट भी नहीं दिया गया। वहीं सुनवाई के दौरान कुछ सालों पहले प्रभुदयाल की मौत होने पर उसके उत्तराधिकारियों ने याचिका जारी रखी। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने सेवा समाप्ति के आदेश को अवैध बताते हुए रद्द कर दिया है। इसके साथ ही प्रभुदयाल को सेवा में मानते हुए
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समस्त परिलाभ तीन माह में अदा करने के आदेश दिए हैं।
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न्यायाधीश एसपी शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश हैड कांस्टेबल प्रभुदयाल के वारिसों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। याचिका में अधिवक्ता विजय पाठक ने अदालत को बताया कि प्रभुदयाल दौसा के सलेमपुरा थाने में कार्यरत था।विभाग ने एक आरोपी को दुर्भावना से बचाने का आरोप लगाते हुए प्रभुदयाल को आरोप पत्र दिया और विभागीय जांच के बाद 1998 में सेवा से पृथक कर दिया। जिसकी विभागीय अपील भी 1999 में खारिज कर दी गई। जिसे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा गया कि जांच अधिकारी ने जांच रिपोर्ट में माना था कि प्रभुदयाल पर लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए।
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इसके बावजूद तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक के प्रभाव के कारण उसकी सेवा समाप्त कर दी गई। उसे दंड देने से पहले अनुशासनिक अधिकारी की ओर से लेटर ऑफ डिसएग्रीमेंट भी नहीं दिया गया। वहीं सुनवाई के दौरान कुछ सालों पहले प्रभुदयाल की मौत होने पर उसके उत्तराधिकारियों ने याचिका जारी रखी। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने सेवा समाप्ति के आदेश को अवैध बताते हुए रद्द कर दिया है। इसके साथ ही प्रभुदयाल को सेवा में मानते हुए
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