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NGT: राजस्थान की लाइम इंडस्ट्री पर संकट, बढ़ेगी बेरोजगारी
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Fri, 19 May 2017 06:49 PM IST
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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल(एनजीटी) के एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद राजस्थान में लाइम इंडस्ट्री पर संकट के बादल गहरा गए है। एनजीटी ने पर्यावरणीय कारणों से इस इंडस्ट्री में काम आने वाले पेट्रोलियम प्रोडेक्ट के उपयोग पर दो माह में रोक लगाने के आदेश राज्य सरकार को दिए हैं।
जो इंडस्ट्रीज पेट्रोलियम प्रोडक्ट(पेटकोक) का इस्तेमाल करते हैं वे सभी दो महीने के बाद बिना अनुमति के पेटकोक काम में नहीं ले पाएंगे। एनजीटी ने इस सम्बंध में राज्य सरकार को नीति बनाने के निर्देश दिए हैं।
लाइमस्टोन खनन में पेटकोक पर पूरी तरह रोक लगाई जाती है तो इसका सीधा असर आम आदमी से लेकर इन उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों पर भी पड़ेगा। इंडस्ट्रीज में उत्पादन महंगा हो जाएगा, जिसके कारण लाइमस्टोन के दाम भी बढ़ेंगे। सीमेंट उत्पादन भी महंगा हो जाएगा।
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जानकारी के अनुसार राजस्थान के जोधपुर, नागौर, चित्तौड़गढ़ सहित कई जिलों में एक हजार के आसपास लाइम इंडस्ट्रीज लगी हुई हैं। एनजीटी का मानना है कि लाइमस्टोन में काम लिया जाने वाला पेटकोक पर्यावरण के लिए खतरा है। जबकि लाइम इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि लाइमस्टोन पर्यावरण में फैले सल्फर को सोखता है। ऐसे में लाइमस्टोन इकोफ्रेंडली है। उधर, मामले को लेकर राजस्थान लाइम मैन्यूफैक्चर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल ने शुक्रवार को पर्यावरण एवं खनिज सचिव से भी मुलाकात कर अपना पक्ष रखा है। इस दल में महेंद्र पीती, नरपतसिंह राजपुरोहित, ओमप्रकाश लाखोटिया समेत अन्य लोग भी उपस्थित रहे।
एसोसिएशन ने राजसिको के अध्यक्ष मेघराज लोहिया से भी मुलाकात की है। लोहिया का कहना है कि वे इस सम्बंध में पर्यावरण विभाग में अपना पक्ष रखेंगे। लोहिया ने बताया कि पूरे देश का 90 फीसदी लाइम का उत्पादन राजस्थान में होता है। राज्य में कृषि के बाद लाइमस्टोन सबसे बड़ा उद्योग है। यहां से देश के अन्य हिस्सों और विदेशों में भी इसका निर्यात किया जाता है। स्टील, एल्यूमिनियम, शुगर जैसी कई चीजों के उत्पादन में लाइम का इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने कहा कि एनजीटी के निर्णय से उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
ये भी है एक कारण पेटकोक के इस्तेमाल का
सीमेंट के भट्टों में कोयल की जरूरत पड़ती है। दिनों दिन महंगे होते कोयले के विकल्प के तौरा पर सीमेंट इंडस्ट्रीज वैकल्पिक ईंधन की तलाश में है। साथ ही ये विकल्प कोयले की तुलना में सस्ता भी होना चाहिए। ऐसे में पेट्रोलियम कोक इसकी कम लागत के कारण सीमेंट इंडस्ट्रीज के सामने विकल्प के तौर पर सामने आता है। अब जरूरत इस बात की जताई जाती है कि पेटकोक के जरिये पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को कैसे कम किया जाए।
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जो इंडस्ट्रीज पेट्रोलियम प्रोडक्ट(पेटकोक) का इस्तेमाल करते हैं वे सभी दो महीने के बाद बिना अनुमति के पेटकोक काम में नहीं ले पाएंगे। एनजीटी ने इस सम्बंध में राज्य सरकार को नीति बनाने के निर्देश दिए हैं।
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लाइमस्टोन खनन में पेटकोक पर पूरी तरह रोक लगाई जाती है तो इसका सीधा असर आम आदमी से लेकर इन उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों पर भी पड़ेगा। इंडस्ट्रीज में उत्पादन महंगा हो जाएगा, जिसके कारण लाइमस्टोन के दाम भी बढ़ेंगे। सीमेंट उत्पादन भी महंगा हो जाएगा।
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जानकारी के अनुसार राजस्थान के जोधपुर, नागौर, चित्तौड़गढ़ सहित कई जिलों में एक हजार के आसपास लाइम इंडस्ट्रीज लगी हुई हैं। एनजीटी का मानना है कि लाइमस्टोन में काम लिया जाने वाला पेटकोक पर्यावरण के लिए खतरा है। जबकि लाइम इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि लाइमस्टोन पर्यावरण में फैले सल्फर को सोखता है। ऐसे में लाइमस्टोन इकोफ्रेंडली है। उधर, मामले को लेकर राजस्थान लाइम मैन्यूफैक्चर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल ने शुक्रवार को पर्यावरण एवं खनिज सचिव से भी मुलाकात कर अपना पक्ष रखा है। इस दल में महेंद्र पीती, नरपतसिंह राजपुरोहित, ओमप्रकाश लाखोटिया समेत अन्य लोग भी उपस्थित रहे।
एसोसिएशन ने राजसिको के अध्यक्ष मेघराज लोहिया से भी मुलाकात की है। लोहिया का कहना है कि वे इस सम्बंध में पर्यावरण विभाग में अपना पक्ष रखेंगे। लोहिया ने बताया कि पूरे देश का 90 फीसदी लाइम का उत्पादन राजस्थान में होता है। राज्य में कृषि के बाद लाइमस्टोन सबसे बड़ा उद्योग है। यहां से देश के अन्य हिस्सों और विदेशों में भी इसका निर्यात किया जाता है। स्टील, एल्यूमिनियम, शुगर जैसी कई चीजों के उत्पादन में लाइम का इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने कहा कि एनजीटी के निर्णय से उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
ये भी है एक कारण पेटकोक के इस्तेमाल का
सीमेंट के भट्टों में कोयल की जरूरत पड़ती है। दिनों दिन महंगे होते कोयले के विकल्प के तौरा पर सीमेंट इंडस्ट्रीज वैकल्पिक ईंधन की तलाश में है। साथ ही ये विकल्प कोयले की तुलना में सस्ता भी होना चाहिए। ऐसे में पेट्रोलियम कोक इसकी कम लागत के कारण सीमेंट इंडस्ट्रीज के सामने विकल्प के तौर पर सामने आता है। अब जरूरत इस बात की जताई जाती है कि पेटकोक के जरिये पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को कैसे कम किया जाए।