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बड़ा सवाल: सीडीएससीओ की जांच में 199 दवा के नमूने गुणवत्ता पर खरे नहीं उतरे, एक नकली मिला; कितनी दवाएं असरहीन?
Mon, 07 Sep 2026 04:50 AM IST
हिमांशु अरविंद मिश्र
हिमांशु अरविंद मिश्र, नई दिल्ली।
हिमांशु अरविंद मिश्र, नई दिल्ली।
Published by: हिमांशु अरविंद मिश्र
Updated Mon, 07 Sep 2026 04:50 AM IST
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दवाओं की गुणवत्ता की जांच
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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जिस दवा के भरोसे मरीज बीमारी से लड़ता है, अगर उसमें जरूरी दवा की मात्रा ही बहुत कम हो तो इलाज का असर भी सवालों के घेरे में आ जाता है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की जांच में 199 दवा नमूने मानक गुणवत्ता पर खरे नहीं उतरे।
सबसे गंभीर मामला दिल के मरीजों को दी जाने वाली क्लोपिडोग्रेल और एस्पिरिन की संयुक्त गोली का है। एक नमूने में क्लोपिडोग्रेल सिर्फ 38.20% और एस्पिरिन 21.8% मिला। यानी दवा के पैकेट पर जितनी मात्रा का दावा था, उसका बड़ा हिस्सा नमूने में मौजूद नहीं था। यह नमूना फार्मारूट्स हेल्थकेयर, हिमाचल प्रदेश का था। जांच में गोली के ठीक से घुलने और फ्री सैलिसिलिक एसिड से जुड़ी गड़बड़ी भी मिली। जेएम लेबोरेटरीज की क्लोपिडोग्रेल और एस्पिरिन वाली एक अन्य दवा भी मानक पर खरी नहीं उतरी। इसमें एस्पिरिन की मात्रा 77.13% और फ्री सैलिसिलिक एसिड 12.01% मिला। क्लोपिडोग्रेल और एस्पिरिन खून में थक्का बनने से रोकने के लिए इस्तेमाल होती हैं।
पेट की दवा में दोनों पदार्थ शून्य मिले
सबसे चौंकाने वाले मामलों में समय फार्मा इंडिया की पेट की समस्या की दवा आर-जारा डीएसआर कैप्सूल शामिल है। इसमें 20 मिलीग्राम रैबेप्राजोल और 30 मिलीग्राम डोमपेरीडोन होने का दावा था, लेकिन जांच में दोनों की मात्रा 0.0 मिलीग्राम मिली। इसके अलावा डिवाइन मेडिकेयर की 300 मिलीग्राम प्रेगाबालिन कैप्सूल में सिर्फ 211.16 मिलीग्राम दवा मिली। एमके हेल्थकेयर की 100 मिलीग्राम इट्राकोनाजोल में मात्रा 63.54 मिलीग्राम मिली, जबकि रेल्टसेन हेल्थकेयर की 5 मिलीग्राम रामिप्रिल में सक्रिय पदार्थ सिर्फ 64.20% पाया गया।
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ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की पहचान जांच में फेल
जैक्सन लेबोरेटरीज का ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन भी जुलाई की सूची में शामिल है। इसमें ऑक्सीटोसिन की पहचान जांच में नमूना मानक पर खरा नहीं उतरा। इसका इस्तेमाल प्रसव के दौरान गर्भाशय के संकुचन समेत कुछ चिकित्सकीय स्थितियों में किया जाता है। पेट की दवाओं में पैंटोप्राजोल और ओमेप्राजोल के कई नमूने भी घुलने की जांच में फेल हुए। कुछ दूसरी दवाओं में सक्रिय पदार्थ की मात्रा, पहचान और हर गोली में समान मात्रा होने से जुड़ी समस्याएं मिलीं।
बड़ी कंपनियों की दवाएं भी सूची में
जांच में केवल छोटी कंपनियों के उत्पाद नहीं हैं। लुपिन, सनोफी इंडिया, जायडस हेल्थकेयर, आईपीका लेबोरेटरीज, मैक्लियोड्स फार्मास्यूटिकल्स, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन फार्मास्यूटिकल्स और कैडिला फार्मास्यूटिकल्स के कुछ उत्पाद भी अलग-अलग जांच में मानक पर खरे नहीं उतरे। एक नमूने को जांच में नकली भी घोषित किया गया। डायबिटिस-ऑल पाउडर में पियोग्लिटाजोन की मौजूदगी मिली, जबकि उत्पाद के दावे से यह मेल नहीं खाता था।
ये भी पढ़ें: दुष्कर्म-हत्या मामला: तेलंगाना सीएम ने दिए मजिस्ट्रेट जांच के आदेश; फास्ट-ट्रैक कोर्ट में होगी सुनवाई?
एंटीबायोटिक और पैरासिटामोल भी सवालों के घेरे में
एंटीबायोटिक की कई दवाएं भी जांच में फेल हुईं। जेएमएच फार्मा की डिओमैक्स-एलबी में 250 मिलीग्राम वाली दवा के मुकाबले अमॉक्सिसिलिन 10.86 मिलीग्राम और क्लोक्सासिलिन 67.73 मिलीग्राम मिला। इसके अलावा कुछ सेफिक्सिम और अमॉक्सिसिलिन-क्लैवुलैनिक एसिड वाली दवाओं में मात्रा, घुलने या पहचान से जुड़ी गड़बड़ी मिली।
बुखार और दर्द में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली पैरासिटामोल की भी कई दवाएं जांच में फेल हुईं। क्योरटेक फॉर्म्युलेशंस, जेनिथ ड्रग्स और अलवेंटा फार्मा की दवाओं में गोली के घुलने की समस्या मिली। विवेक फार्माकेम के बच्चों वाले पैरासिटामोल सिरप में सूक्ष्मजीव संबंधी जांच में खामी मिली।
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सबसे गंभीर मामला दिल के मरीजों को दी जाने वाली क्लोपिडोग्रेल और एस्पिरिन की संयुक्त गोली का है। एक नमूने में क्लोपिडोग्रेल सिर्फ 38.20% और एस्पिरिन 21.8% मिला। यानी दवा के पैकेट पर जितनी मात्रा का दावा था, उसका बड़ा हिस्सा नमूने में मौजूद नहीं था। यह नमूना फार्मारूट्स हेल्थकेयर, हिमाचल प्रदेश का था। जांच में गोली के ठीक से घुलने और फ्री सैलिसिलिक एसिड से जुड़ी गड़बड़ी भी मिली। जेएम लेबोरेटरीज की क्लोपिडोग्रेल और एस्पिरिन वाली एक अन्य दवा भी मानक पर खरी नहीं उतरी। इसमें एस्पिरिन की मात्रा 77.13% और फ्री सैलिसिलिक एसिड 12.01% मिला। क्लोपिडोग्रेल और एस्पिरिन खून में थक्का बनने से रोकने के लिए इस्तेमाल होती हैं।
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पेट की दवा में दोनों पदार्थ शून्य मिले
सबसे चौंकाने वाले मामलों में समय फार्मा इंडिया की पेट की समस्या की दवा आर-जारा डीएसआर कैप्सूल शामिल है। इसमें 20 मिलीग्राम रैबेप्राजोल और 30 मिलीग्राम डोमपेरीडोन होने का दावा था, लेकिन जांच में दोनों की मात्रा 0.0 मिलीग्राम मिली। इसके अलावा डिवाइन मेडिकेयर की 300 मिलीग्राम प्रेगाबालिन कैप्सूल में सिर्फ 211.16 मिलीग्राम दवा मिली। एमके हेल्थकेयर की 100 मिलीग्राम इट्राकोनाजोल में मात्रा 63.54 मिलीग्राम मिली, जबकि रेल्टसेन हेल्थकेयर की 5 मिलीग्राम रामिप्रिल में सक्रिय पदार्थ सिर्फ 64.20% पाया गया।
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ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की पहचान जांच में फेल
जैक्सन लेबोरेटरीज का ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन भी जुलाई की सूची में शामिल है। इसमें ऑक्सीटोसिन की पहचान जांच में नमूना मानक पर खरा नहीं उतरा। इसका इस्तेमाल प्रसव के दौरान गर्भाशय के संकुचन समेत कुछ चिकित्सकीय स्थितियों में किया जाता है। पेट की दवाओं में पैंटोप्राजोल और ओमेप्राजोल के कई नमूने भी घुलने की जांच में फेल हुए। कुछ दूसरी दवाओं में सक्रिय पदार्थ की मात्रा, पहचान और हर गोली में समान मात्रा होने से जुड़ी समस्याएं मिलीं।
बड़ी कंपनियों की दवाएं भी सूची में
जांच में केवल छोटी कंपनियों के उत्पाद नहीं हैं। लुपिन, सनोफी इंडिया, जायडस हेल्थकेयर, आईपीका लेबोरेटरीज, मैक्लियोड्स फार्मास्यूटिकल्स, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन फार्मास्यूटिकल्स और कैडिला फार्मास्यूटिकल्स के कुछ उत्पाद भी अलग-अलग जांच में मानक पर खरे नहीं उतरे। एक नमूने को जांच में नकली भी घोषित किया गया। डायबिटिस-ऑल पाउडर में पियोग्लिटाजोन की मौजूदगी मिली, जबकि उत्पाद के दावे से यह मेल नहीं खाता था।
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एंटीबायोटिक और पैरासिटामोल भी सवालों के घेरे में
एंटीबायोटिक की कई दवाएं भी जांच में फेल हुईं। जेएमएच फार्मा की डिओमैक्स-एलबी में 250 मिलीग्राम वाली दवा के मुकाबले अमॉक्सिसिलिन 10.86 मिलीग्राम और क्लोक्सासिलिन 67.73 मिलीग्राम मिला। इसके अलावा कुछ सेफिक्सिम और अमॉक्सिसिलिन-क्लैवुलैनिक एसिड वाली दवाओं में मात्रा, घुलने या पहचान से जुड़ी गड़बड़ी मिली।
बुखार और दर्द में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली पैरासिटामोल की भी कई दवाएं जांच में फेल हुईं। क्योरटेक फॉर्म्युलेशंस, जेनिथ ड्रग्स और अलवेंटा फार्मा की दवाओं में गोली के घुलने की समस्या मिली। विवेक फार्माकेम के बच्चों वाले पैरासिटामोल सिरप में सूक्ष्मजीव संबंधी जांच में खामी मिली।