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SC: दोषी की सजा माफी पर सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी, कहा- पीठासीन जज की राय पर नहीं दे सकते अत्याधिक जोर

Sat, 26 Aug 2023 10:29 PM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Jeet Kumar Updated Sat, 26 Aug 2023 10:29 PM IST
सार

पीठ बिहार निवासी राजो उर्फ राजेंद्र मंडल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। राजो को दो पुलिस कर्मियों समेत तीन लोगों की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी, उसने छूट आवेदन में अस्वीकृति को चुनौती दी थी।

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sc said the opinion of the presiding judge is important for the release of the convict
सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीठासीन न्यायाधीश की राय पर ‘अत्याधिक जोर’ नहीं दिया जा सकता है। अन्य प्राधिकारियों की टिप्पणियों की पूरी तरह से अवहेलना नहीं की जा सकती है। क्योंकि इससे किसी दोषी की सजा माफी के आवेदन पर सरकार का फैसला अस्थिर हो जाएगा।

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जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने शुक्रवार को दिए आदेश में कहा कि राज्य सरकार के सजा माफी बोर्ड को किसी दोषी की समयपूर्व रिहाई के आवेदन पर विचार करते समय पूरी तरह से पीठासीन न्यायाधीश की राय या पुलिस की तैयार की गई रिपोर्ट पर भरोसा नहीं करना चाहिए। 
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पीठ बिहार निवासी राजो उर्फ राजेंद्र मंडल की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। राजो को दो पुलिस कर्मियों समेत तीन लोगों की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी, उसने छूट आवेदन में अस्वीकृति को चुनौती दी थी।
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24 साल से जेल में बिना पैरोल सजा काट रहा आरोपी मंडल
पीठ ने कहा कि मंडल को जिसे हत्या और शस्त्र अधिनियम के तहत अपराधों का दोषी ठहराया गया था, वह 24 साल से बिना किसी छूट या पैरोल के हिरासत में है, और उसके माफी आवेदन को पीठासीन न्यायाधीश और पुलिस अधीक्षक की प्रतिकूल रिपोर्ट के कारण छूट बोर्ड द्वारा दो बार खारिज कर दिया गया है। 

बिहार जेल मैनुअल में क्या हैं सजा में छूट के नियम
पीठासीन न्यायाधीश ने दो बार और एसपी ने एक बार मंडल की रिहाई के खिलाफ प्रतिकूल रिपोर्ट दी थी। बिहार जेल मैनुअल में छूट नियमों के अनुसार, समयपूर्व रिहाई के किसी भी आवेदन पर विचार करने से पहले सजा बोर्ड द्वारा दोषी अदालत के पीठासीन न्यायाधीश, परिवीक्षा अधिकारी और पुलिस अधीक्षक की राय मांगी जाती है।

बता दें कि सीआरपीसी की धारा 432(1) उपयुक्त सरकार को किसी दोषी की सजा निलंबित करने या कम करने का अधिकार देती है। सीआरपीसी की धारा 432(2) उस प्रक्रिया को निर्धारित करती है जिसके तहत उपयुक्त सरकार उस अदालत के पीठासीन न्यायाधीश की राय ले सकती है, जिसके पहले या जिसके द्वारा आवेदक को दोषी ठहराया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा अपराधी कारावास की लंबी अवधि काट चुका है
पीठ ने कहा कि कारावास का उद्देश्य और अंतिम लक्ष्य, यहां तक कि सबसे गंभीर अपराध में भी, सुधारात्मक है। अपराधी कारावास के माध्यम से पर्याप्त लंबी अवधि की सजा काट चुका है। शीर्ष अदालत ने पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट पर भी अपनी चिंता व्यक्त की जो मंडल के मामले में दूसरे दौर में प्रतिकूल थी और कहा कि प्रत्येक मामले में, उपयुक्त सरकार को अपराध के अव्यक्त पूर्वाग्रहों का संज्ञान लेना होगा कि पुलिस के साथ-साथ जांच एजेंसी भी इसका हवाला दे रही है, खासकर मौजूदा मामले में, जहां मारे गए पीड़ित खुद पुलिस कर्मी थे, यानी पुलिस बल के सदस्य थे।


पीठ ने राज्य के रिमिशन बोर्ड को तीन महीने के भीतर राजो उर्फ राजेंद्र मंडल के मामले पर पुनर्विचार करने को कहा है और संबंधित पीठासीन न्यायाधीश को इस फैसले की तारीख से एक महीने के भीतर मंडल के आवेदन पर एक राय देने को कहा।

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