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BJP: वसुंधरा-शिवराज पर अंतिम क्षण तक रहा सस्पेंस, भाजपा को इससे लाभ होगा या नुकसान
सार
केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी अंतिम समय तक यह निर्णय नहीं कर पाई कि अपने इन नेताओं का उसे किस तरह उपयोग करना है। वह उन्हें केंद्र में लाने पर विचार कर रही है, या राज्य में नया नेतृत्व विकसित करने के लिए उन्हें विराम दिया जा रहा है, इस पर अंतिम समय तक सस्पेंस बना रहा।
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शिवराज-वसुंधरा
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विस्तार
भाजपा इस बार विधानसभा चुनावों में टिकटों को लेकर काफी असमंजस की स्थिति में दिखाई पड़ी। शिवराज सिंह चौहान हों या वसुंधरा राजे सिंधिया, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह हों या तेलंगाना में बंडी संजय कुमार को महत्त्वपूर्ण भूमिका देने की बात, पार्टी हर जगह भ्रम की स्थिति में रही।
केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी अंतिम समय तक यह निर्णय नहीं कर पाई कि अपने इन नेताओं का उसे किस तरह उपयोग करना है। वह उन्हें केंद्र में लाने पर विचार कर रही है, या राज्य में नया नेतृत्व विकसित करने के लिए उन्हें विराम दिया जा रहा है, इस पर अंतिम समय तक सस्पेंस बना रहा। शिवराज सिंह तो अपने टिकट तक को लेकर आश्वस्त नहीं थे। एक जनसभा के दौरान 'मुझे चुनाव लड़ना चाहिए या नहीं' जैसे उनके बयान उनकी हताशा दिखाने वाले थे। वसुंधरा राजे भी अपनी भूमिका को लेकर साफ स्थिति न होने के कारण चुनाव में अभी तक पूरे दमखम के साथ सक्रिय नहीं हुई हैं।
पार्टी नेतृत्व की इस असमंजस वाली स्थिति से कार्यकर्ताओं के साथ-साथ मतदाताओं तक में भ्रम की स्थिति देखी गई। भाजपा का यह स्टैंड किसी सोची-समझी रणनीति का परिणाम था, या उसकी दुविधा का असर, कहना मुश्किल है। भाजपा की इस दुविधा का उसे लाभ होगा, या नुकसान, यह बड़ा प्रश्न है?
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अपने नेताओं को विवश दिखाया
राजनीतिक विश्लेषक अजयराज शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा ने इस पूरे चुनाव में अपने दिग्गज नेताओं को जनता के सामने विवश-हताश और 'कुछ भी न कर पाने लायक' दिखा दिया। वसुंधरा राजे सिंधिया और शिवराज जैसे नेता जो नेता कभी पूरे राज्य की सीटों पर उम्मीदवार तय करते थे, इस चुनाव में स्वयं अपने टिकट को लेकर तरसते दिखाई पड़े। इससे जनता के साथ-साथ कार्यकर्ताओं तक में उनकी ताकत बहुत कमजोर हुई है।
अब यदि इन राज्यों में भाजपा की सरकार बन जाए और कमान इन्हीं नेताओं के हाथ में रहे तब भी ये अपने पुराने दमखम वाले अंदाज में सत्ता नहीं चला सकेंगे। क्योंकि हर कार्यकर्ता ने उन्हें स्वयं अपनी टिकट के लिए तरसते देखा है। प्रशासन पर भी इन नेताओं की वह पकड़ नहीं रह पाएगी।
अजय राज शर्मा ने कहा कि, इस पूरे प्रकरण में दो बातें बहुत स्पष्ट हैं। एक तो यह कि जनता के साथ-साथ कार्यकर्ताओ तक को यह साफ संदेश दे दिया गया है कि प्रदेश के छत्रपों के हाथ कोई सत्ता नहीं है। पार्टी में जो भी निर्णय होगा, वह केंद्रीय स्तर से लिया जाएगा। प्रदेश के नेताओं का कार्य केवल केंद्र के आदेशों का पालन करने तक सीमित है। दूसरा यह कि, टिकटों की दावेदारी के लिए जो कार्यकर्ता प्रदेश के नेताओं के घरों के चक्कर काटते थे, उन्हें यह संदेश दे दिया गया है कि इनके चक्कर काटने से कोई काम नहीं होने वाला है। वे केवल अपने क्षेत्रों में काम करें। टिकट का निर्णय पार्टी के स्तर पर ही लिया जाएगा।
लाभ या नुकसान
पार्टी की इस नीति का उसे लाभ होगा, या नुकसान, अभी कहना मुश्किल है। लेकिन एक बात तय है कि इससे क्षेत्रीय स्तर पर पार्टी में गुटबंदी कमजोर करने में मदद मिलेगी। क्षेत्रीय नेता अपने जिस दमखम के सहारे केंद्रीय नेताओं को चुनौती देते थे, वह बहुत हद तक कमजोर हो जाएगी।
दरअसल, यूपी से लेकर गुजरात तक, भाजपा ने एक सफल प्रयोग किया है। उसने केवल विचारधारा का प्रचार किया है, जिससे उसके सिंबल पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार की जीत तय हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014-19 के लोकसभा चुनावों में प्रचार के दौरान कहा कि लोग केवल उन्हें देखकर वोट करें। उनका हर वोट उन्हें ही मिलेगा। यह केवल विचारधारा पर वोट करने वाले समाज के आधार पर ही संभव हो सकता है। पार्टी इसी तरह का वैचारिक आधार निश्चित करना चाहती है जहां व्यक्ति बदलने के बाद भी उसकी पकड़ बनी रहे। बहुत हद तक यह काम वामपंथी दल अपने शासनकाल के दौरान करते रहे हैं।
लेकिन इन चुनावों में उसे इस भ्रम को लेकर नुकसान हो सकता है। जिस भारतीय समाज में नेता के चेहरे पर पूरा चुनाव केंद्रित होता है, वहां अपने सबसे बड़े चेहरों को कमजोर करके दिखाना, उन्हें खुद अपनी सीटों के लिए संघर्ष करते दिखाने से उनकी पकड़ कमजोर हुई है। इसका भाजपा के प्रतिद्वंदी दल लाभ उठा सकते हैं। कड़े मुकाबले में यह रणनीति बड़ा अंतर पैदा कर सकती है।
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केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी अंतिम समय तक यह निर्णय नहीं कर पाई कि अपने इन नेताओं का उसे किस तरह उपयोग करना है। वह उन्हें केंद्र में लाने पर विचार कर रही है, या राज्य में नया नेतृत्व विकसित करने के लिए उन्हें विराम दिया जा रहा है, इस पर अंतिम समय तक सस्पेंस बना रहा। शिवराज सिंह तो अपने टिकट तक को लेकर आश्वस्त नहीं थे। एक जनसभा के दौरान 'मुझे चुनाव लड़ना चाहिए या नहीं' जैसे उनके बयान उनकी हताशा दिखाने वाले थे। वसुंधरा राजे भी अपनी भूमिका को लेकर साफ स्थिति न होने के कारण चुनाव में अभी तक पूरे दमखम के साथ सक्रिय नहीं हुई हैं।
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पार्टी नेतृत्व की इस असमंजस वाली स्थिति से कार्यकर्ताओं के साथ-साथ मतदाताओं तक में भ्रम की स्थिति देखी गई। भाजपा का यह स्टैंड किसी सोची-समझी रणनीति का परिणाम था, या उसकी दुविधा का असर, कहना मुश्किल है। भाजपा की इस दुविधा का उसे लाभ होगा, या नुकसान, यह बड़ा प्रश्न है?
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अपने नेताओं को विवश दिखाया
राजनीतिक विश्लेषक अजयराज शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा ने इस पूरे चुनाव में अपने दिग्गज नेताओं को जनता के सामने विवश-हताश और 'कुछ भी न कर पाने लायक' दिखा दिया। वसुंधरा राजे सिंधिया और शिवराज जैसे नेता जो नेता कभी पूरे राज्य की सीटों पर उम्मीदवार तय करते थे, इस चुनाव में स्वयं अपने टिकट को लेकर तरसते दिखाई पड़े। इससे जनता के साथ-साथ कार्यकर्ताओं तक में उनकी ताकत बहुत कमजोर हुई है।
अब यदि इन राज्यों में भाजपा की सरकार बन जाए और कमान इन्हीं नेताओं के हाथ में रहे तब भी ये अपने पुराने दमखम वाले अंदाज में सत्ता नहीं चला सकेंगे। क्योंकि हर कार्यकर्ता ने उन्हें स्वयं अपनी टिकट के लिए तरसते देखा है। प्रशासन पर भी इन नेताओं की वह पकड़ नहीं रह पाएगी।
अजय राज शर्मा ने कहा कि, इस पूरे प्रकरण में दो बातें बहुत स्पष्ट हैं। एक तो यह कि जनता के साथ-साथ कार्यकर्ताओ तक को यह साफ संदेश दे दिया गया है कि प्रदेश के छत्रपों के हाथ कोई सत्ता नहीं है। पार्टी में जो भी निर्णय होगा, वह केंद्रीय स्तर से लिया जाएगा। प्रदेश के नेताओं का कार्य केवल केंद्र के आदेशों का पालन करने तक सीमित है। दूसरा यह कि, टिकटों की दावेदारी के लिए जो कार्यकर्ता प्रदेश के नेताओं के घरों के चक्कर काटते थे, उन्हें यह संदेश दे दिया गया है कि इनके चक्कर काटने से कोई काम नहीं होने वाला है। वे केवल अपने क्षेत्रों में काम करें। टिकट का निर्णय पार्टी के स्तर पर ही लिया जाएगा।
लाभ या नुकसान
पार्टी की इस नीति का उसे लाभ होगा, या नुकसान, अभी कहना मुश्किल है। लेकिन एक बात तय है कि इससे क्षेत्रीय स्तर पर पार्टी में गुटबंदी कमजोर करने में मदद मिलेगी। क्षेत्रीय नेता अपने जिस दमखम के सहारे केंद्रीय नेताओं को चुनौती देते थे, वह बहुत हद तक कमजोर हो जाएगी।
दरअसल, यूपी से लेकर गुजरात तक, भाजपा ने एक सफल प्रयोग किया है। उसने केवल विचारधारा का प्रचार किया है, जिससे उसके सिंबल पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार की जीत तय हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014-19 के लोकसभा चुनावों में प्रचार के दौरान कहा कि लोग केवल उन्हें देखकर वोट करें। उनका हर वोट उन्हें ही मिलेगा। यह केवल विचारधारा पर वोट करने वाले समाज के आधार पर ही संभव हो सकता है। पार्टी इसी तरह का वैचारिक आधार निश्चित करना चाहती है जहां व्यक्ति बदलने के बाद भी उसकी पकड़ बनी रहे। बहुत हद तक यह काम वामपंथी दल अपने शासनकाल के दौरान करते रहे हैं।
लेकिन इन चुनावों में उसे इस भ्रम को लेकर नुकसान हो सकता है। जिस भारतीय समाज में नेता के चेहरे पर पूरा चुनाव केंद्रित होता है, वहां अपने सबसे बड़े चेहरों को कमजोर करके दिखाना, उन्हें खुद अपनी सीटों के लिए संघर्ष करते दिखाने से उनकी पकड़ कमजोर हुई है। इसका भाजपा के प्रतिद्वंदी दल लाभ उठा सकते हैं। कड़े मुकाबले में यह रणनीति बड़ा अंतर पैदा कर सकती है।