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अब बिना मिट्टी के उगेंगी सब्जियां
शिमला/अरुणा अचल
Updated Mon, 15 Apr 2013 11:06 AM IST
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अगर सब कुछ सही रहा तो आलू के बाद अब शिमला मिर्च और टमाटर भी बिना मिट्टी के उगाया जा सकेगा। केंद्रीय आलू अनुसंधान के वैज्ञानिक एरोपोनिक तकनीक से साफ सुथरी और बैक्टीरिया रहित सब्जियां हवा में उगाने की तैयारी में हैं, जिसमें मिट्टी का एक भी कण नहीं होगा। शिमला मिर्च और टमाटर पर इसका प्रयोग शुरू हो गया है। इससे पहले इस तकनीक से आलू तैयार करने में सफलता पाई है।
केंद्रीय आलू अनुसंधान के वैज्ञानिकों की मेहनत रंग लाई तो आने वाले समय में मिट्टी व बीमारी रहित सब्जियां लोगों के किचन की शोभा बढ़ाएगी और सेहत भी बरकरार रखेंगी। वैज्ञानिकों ने अब अन्य सब्जियों पर भी तकनीक का प्रयोग करने की दिशा में रिसर्च शुरू कर दिया है। शिमला स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के निदेशक व वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. बीरपाल सिंह ने शिमला मिर्च व टमाटर पर एरोपोनिक तकनीक अपनाने की पुष्टि की है।
निदेशक के अनुसार इस तकनीक से जहां सब्जियों का उत्पादन बढ़ने की संभावना है, वहीं लोगों को साफ सुथरी और बीमारी रहित सब्जियां खाने को मिलेंगी। शिमला मिर्च व टमाटर के अलावा हमारी कोशिश सभी टयूबर व राइबोरस क्राप को भी एरोपोनिक तकनीक से उगाने की रहेगी। इस तकनीक को हरी पत्तेदार सब्जियों के साथ-साथ हल्दी व अदरक पर भी आजमाने की दिशा में विचार चल रहा है। हाल ही में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पाइस रिसर्च के निदेशक ने इस तकनीक को अदरक पर लागू करने की इच्छा व्यक्त की है।
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एक साल में आलू की 3 फसलें
आलू पर एरोपोनिक तकनीक का प्रयोग सफल रहा है। सीपीआरआई में एरोपोनिक विधि से बीज आलू उगाया जा रहा है, जिसके लिए संस्थान में दो यूनिट स्थापित किए गए हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि एरोपोनिक विधि से पैदा किए जा रहे मिट्टी रहित आलू की उत्पादन क्षमता मिट्टी में पैदा होने वाले आलू के मुकाबले तीन गुना अधिक है और एक साल में इस विधि के प्रयोग से तीन फसलें ली जा सकती हैं।
क्या है एरोपोनिक तकनीक
इस तकनीक में आलू या सब्जी को बिना मिट्टी के उगाया जाता है। इसके लिए प्लास्टिक, थर्माकोल या किसी ऐसी वस्तु के बाक्स बनाकर इसमें माइक्रोप्लांट डाले जाते है जिसमें 15 दिनों तक न्यूट्रीयंट सोल्यूशन (होगलेंट) पास किया जाता है ताकि जड़ों का विकास हो सके।
एक बार जड़े आ जाएं उसके बाद पौधों की जड़ों में ट्यूबर बनना शुरू हो जाता है। इस तकनीक के माध्यम से प्राप्त होने वाले आलू या सब्जी मिट्टी व बीमारी रहित होते हैं। इनमें उत्पादन शक्ति भी मिट्टी में लगने वाली फसल के मुकाबले कहीं अधिक होती है। हालांकि, यह तकनीक अभी संस्थान के पास ही है और इसे किसानों तक पहुंचाने में समय लगेगा।
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केंद्रीय आलू अनुसंधान के वैज्ञानिकों की मेहनत रंग लाई तो आने वाले समय में मिट्टी व बीमारी रहित सब्जियां लोगों के किचन की शोभा बढ़ाएगी और सेहत भी बरकरार रखेंगी। वैज्ञानिकों ने अब अन्य सब्जियों पर भी तकनीक का प्रयोग करने की दिशा में रिसर्च शुरू कर दिया है। शिमला स्थित केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान के निदेशक व वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. बीरपाल सिंह ने शिमला मिर्च व टमाटर पर एरोपोनिक तकनीक अपनाने की पुष्टि की है।
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निदेशक के अनुसार इस तकनीक से जहां सब्जियों का उत्पादन बढ़ने की संभावना है, वहीं लोगों को साफ सुथरी और बीमारी रहित सब्जियां खाने को मिलेंगी। शिमला मिर्च व टमाटर के अलावा हमारी कोशिश सभी टयूबर व राइबोरस क्राप को भी एरोपोनिक तकनीक से उगाने की रहेगी। इस तकनीक को हरी पत्तेदार सब्जियों के साथ-साथ हल्दी व अदरक पर भी आजमाने की दिशा में विचार चल रहा है। हाल ही में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पाइस रिसर्च के निदेशक ने इस तकनीक को अदरक पर लागू करने की इच्छा व्यक्त की है।
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एक साल में आलू की 3 फसलें
आलू पर एरोपोनिक तकनीक का प्रयोग सफल रहा है। सीपीआरआई में एरोपोनिक विधि से बीज आलू उगाया जा रहा है, जिसके लिए संस्थान में दो यूनिट स्थापित किए गए हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि एरोपोनिक विधि से पैदा किए जा रहे मिट्टी रहित आलू की उत्पादन क्षमता मिट्टी में पैदा होने वाले आलू के मुकाबले तीन गुना अधिक है और एक साल में इस विधि के प्रयोग से तीन फसलें ली जा सकती हैं।
क्या है एरोपोनिक तकनीक
इस तकनीक में आलू या सब्जी को बिना मिट्टी के उगाया जाता है। इसके लिए प्लास्टिक, थर्माकोल या किसी ऐसी वस्तु के बाक्स बनाकर इसमें माइक्रोप्लांट डाले जाते है जिसमें 15 दिनों तक न्यूट्रीयंट सोल्यूशन (होगलेंट) पास किया जाता है ताकि जड़ों का विकास हो सके।
एक बार जड़े आ जाएं उसके बाद पौधों की जड़ों में ट्यूबर बनना शुरू हो जाता है। इस तकनीक के माध्यम से प्राप्त होने वाले आलू या सब्जी मिट्टी व बीमारी रहित होते हैं। इनमें उत्पादन शक्ति भी मिट्टी में लगने वाली फसल के मुकाबले कहीं अधिक होती है। हालांकि, यह तकनीक अभी संस्थान के पास ही है और इसे किसानों तक पहुंचाने में समय लगेगा।