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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Una News ›   There is not even a road to the house of 1971 war hero Vir Chakra winner Captain Sukhdev Singh.

Una News: 1971 जंग के हीरो वीर चक्र विजेता कैप्टन सुखदेव सिंह के घर को रास्ता भी नहीं

Mon, 16 Dec 2024 07:28 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Mon, 16 Dec 2024 07:28 PM IST
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There is not even a road to the house of 1971 war hero Vir Chakra winner Captain Sukhdev Singh.
बलिदान सूबेदार सीताराम। फाइल फोटो
विजय दिवस पर विशेष
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स्वतंत्रता सेनानी तेजा सिंह के परिवार की विरासत दुर्दशा की शिकार
गांव मवा कहोलां में बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे जवान सुखदेव सिंह
1971 की जंग में दुश्मन के सुदृढ़ ठिकानों पर किया था ग्रेनेड बमों से हमला

संवाद न्यूज एजेंसी

घनारी (ऊना)। भारत के स्वतंत्रता संग्राम और 1971 के भारत-पाक युद्ध में अपनी वीरता की मिसाल पेश करने वाले परिवार को आज सरकारी उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। स्वतंत्रता सेनानी तेजा सिंह के परिवार की शौर्य गाथा इतिहास में दर्ज है। लेकिन उनकी विरासत आज दुर्दशा की शिकार है। 84 वर्षीय ऑनरेरी कैप्टन सुखदेव सिंह, जिन्होंने अभी हाल ही में अपने एक घुटने को रिप्लेस करवाया है। उन्हें 1971 के युद्ध में वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। आज भी अपने गगरेट क्षेत्र के गांव मवा कहोलां में बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनके घर तक पहुंचने के लिए एक अदद रास्ता भी नहीं है। जिसकी फरियाद लिखित में वे जिलाधीश ऊना और स्थानीय विधायक से लगा चुके हैं। यह विडंबना है कि एक ऐसा परिवार जिसने स्वतंत्रता और भारत की सुरक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित किया, उसे आज उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है।
कैप्टन सुखदेव सिंह के पिता तेजा सिंह आजाद हिंद फौज के स्वतंत्रता सेनानी रहे। उनके बड़े बेटे सुखचैन सिंह 1971 के लोंगेवाल युद्ध में राजस्थान की रेतीली सरहद पर शहीद हुए तथा दूसरे बेटे कैप्टन सुखदेव सिंह ने उसी युद्ध में अपनी असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया था। 1971 के भारत पाक युद्ध में लांस हवलदार के रूप में डोगरा रेजिमेंट की अग्रिम टुकड़ी के कमांडर रहते हुए सुखदेव सिंह ने पूर्वी सेक्टर में दुश्मन के सुदृढ़ ठिकानों पर ग्रेनेड बमों से हमला कर न केवल उनकी मशीन गन को निष्क्रिय किया, बल्कि दुश्मन के कई सैनिकों को संगीन से मार गिराया। उनकी इस कार्यवाही ने उनकी बटालियन को लक्ष्य प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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युद्ध में कोई चुनौती नहीं होती। केवल भारत माता की जय और ज्वाला माता की जय का जुनून होता है। यह कहना है 84 वर्षीय कैप्टन सुखदेव सिंह का।
सरकारी उपेक्षा का दंश–
आज इस वीर योद्धा के घर तक कोई पक्का रास्ता तक नहीं है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में कैप्टन सुखदेव सिंह खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं। वे कहते हैं, हमने देश के लिए परिवार, रिश्ते, सब कुछ भुला दिया। लेकिन आज हमें लगता है कि सरकार ने हमें भुला दिया है। कैप्टन सुखदेव सिंह के परिवार में दो विवाहित बेटे, बहुएं, एक पौत्र और तीन पौत्रियां रहती हैं। उनकी तीन बेटियां भी हैं, जो विवाहित हैं। लेकिन इस गौरवशाली परिवार को न तो वह सम्मान मिला, जिसके वे हकदार हैं, और न ही मूलभूत सुविधाएं। कैप्टन सुखदेव सिंह ने मांग की है कि उनके घर को रास्ते का निर्माण किया जाए तथा उनके शहीद भाई सुखचैन सिंह के नाम पर मवां कहोलां में स्टेडियम बनाया जाए।
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सूबेदार सीताराम को वीरता के लिए मिला था वीर चक्र
1971 भारत-पाक युद्ध में दुश्मन से लड़ते हुए थे बलिदान

संवाद न्यूज एजेंसी

मुबारिकपुर (ऊना)। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही अंतिम निशां होगा। यह पंक्ति हमें देश के लिए बलिदान हुई जवानों के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि के लिए प्रेरित करती है। 16 दिसंबर को भारत में विजय दिवस मनाया जाता है। इसी दिन वर्ष 1971 में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में ऐतिहासिक जीत हासिल की। वीर बलिदान दिवस पर ऐसे ही ऊना जिला के गगरेट क्षेत्र के भद्रकाली से संबंध रखने वाले 8 ग्रेनेडियर के सूबेदार सीता राम की वीरता साहस को आज भी नमन किया जाता है। उन्होंने 1971 भारत-पाक युद्ध में भारत माता के रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया व देशसेवा से हिमाचल का सीना चौड़ा किया। 8 ग्रेनेडियर बटालियन को चक्रा बटालियन बैटल सम्मान नवाजा गया है।


वीर चक्र प्राप्त शहीद सीताराम भारत-पाक 1971 युद्ध के दौरान 11-12 दिसम्बर को पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए किए गए। इस दौरान दुश्मन के हमले में शहीद हुए। वीर चक्र पुरस्कार से पुरस्कृत वीर सपूत सूबेदार सीता राम की शहादत के बाद उनके परिवार में उनकी पत्नी कृष्णा देवी (85), दो बेटे यशपाल सिंह, सतपाल सिंह तथा दो बेटियां कांता देवी कमलेश कुमारी हैं। उनके बच्चे अच्छे पदों पर सेवाएं दे चुके हैं। बड़े बेटे यशपाल सिंह एसबीआई से वरिष्ठ मैनेजर पद से सेवानिवृत्त, वही छोटे बेटे 8 ग्रेनेडियर से साल 1999 में पेंशन आए। उनके दामाद 8 ग्रेनेडियर से ही 2006 में कैप्टन पेंशन पर आए। उनके बेटे यशपाल सिंह व दामाद गुरदयाल जरियाल ने बताया कि समय-समय पर चक्रा बटालियन की तरफ से उनके परिवार का कुशल क्षेम पूछा जाता है। सरकार की तरफ से भी समय-समय पर याद किया जाता है।

राज्य स्तरीय मास्टर एथलीस्ट गेम्स के वॉलीबॉल मुकाबले के दौरान  खिलाड़ी । संवाद

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