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Una News: देवस्थल से बाहर आए गुग्गा, घर-घर जाकर दे रहे लोगों को दर्शन
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ऊना में डोहरु मंडलियां गुग्गा जाहरवीर का गुनगान करते हुए।संवाद
- फोटो : परिजन
कृष्ण जन्माष्टमी पर गुग्गा माड़ी लौटेंगे देव गुग्गा
उत्तर भारत के कई राज्यों में मनाया जाता है यह पर्व
पंकज चब्बा
संतोषगढ़ (ऊना)। भाद्रपद मास की अष्टमी तक गुग्गा अपने देवस्थल से निकलकर लोगों के घर-घर जाकर दर्शन देते हैं। उनके चेले और डोहरु मंडलियां वर्षों से घर-घर दस्तक देकर गुग्गा की शक्ति का गुणगान करती आ रही हैं। जिले के चकसराय गांव के सदियों पुराने गुग्गा मंदिर, कड़पे वाले गुग्गा मंदिर, मकरैड के राजा भृतहरि मंदिर, डंगोली के राजा भृतहरि मंदिर सहित अन्य देवस्थलों से गुग्गा के छत्र और प्रतीकात्मक छड़ें, रक्षा बंधन के दिन पूजा के बाद, डोहरु मंडलियों के साथ गांव-गांव पहुंचती हैं और गुग्गा की गाथा का गुणगान करती हैं। यह क्रम श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तक चलता है। जन्माष्टमी की शाम को देव गुग्गा अपने स्थान गुग्गा माड़ी लौट जाते हैं। अगले दिन, जिसे गुग्गा नवमी कहा जाता है, सांपों के देवता माने जाने वाले गुग्गा जाहरपीर का जन्मोत्सव पारंपरिक श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाता है। गुग्गा नवमी से ही भंडारे लगाने और छिंज मेलों के आयोजन की शुरुआत होती है। इस वर्ष गुग्गा नवमी का त्योहार रविवार 17 अगस्त को मनाया जाएगा।
गुग्गा नवमी का त्योहार देश के कई राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़ और विशेष रूप से राजस्थान में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। राजस्थान में यह एक प्रमुख लोकपर्व है, जिसे गुग्गा नवमी या गोगा नवमी के नाम से जाना जाता है। इस बार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि 17 अगस्त को पड़ रही है, जिसे गुग्गा नवमी के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन नागों की पूजा होती है। मान्यता है कि वीर जाहरवीर अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
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उत्तर भारत के कई राज्यों में मनाया जाता है यह पर्व
पंकज चब्बा
संतोषगढ़ (ऊना)। भाद्रपद मास की अष्टमी तक गुग्गा अपने देवस्थल से निकलकर लोगों के घर-घर जाकर दर्शन देते हैं। उनके चेले और डोहरु मंडलियां वर्षों से घर-घर दस्तक देकर गुग्गा की शक्ति का गुणगान करती आ रही हैं। जिले के चकसराय गांव के सदियों पुराने गुग्गा मंदिर, कड़पे वाले गुग्गा मंदिर, मकरैड के राजा भृतहरि मंदिर, डंगोली के राजा भृतहरि मंदिर सहित अन्य देवस्थलों से गुग्गा के छत्र और प्रतीकात्मक छड़ें, रक्षा बंधन के दिन पूजा के बाद, डोहरु मंडलियों के साथ गांव-गांव पहुंचती हैं और गुग्गा की गाथा का गुणगान करती हैं। यह क्रम श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तक चलता है। जन्माष्टमी की शाम को देव गुग्गा अपने स्थान गुग्गा माड़ी लौट जाते हैं। अगले दिन, जिसे गुग्गा नवमी कहा जाता है, सांपों के देवता माने जाने वाले गुग्गा जाहरपीर का जन्मोत्सव पारंपरिक श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाता है। गुग्गा नवमी से ही भंडारे लगाने और छिंज मेलों के आयोजन की शुरुआत होती है। इस वर्ष गुग्गा नवमी का त्योहार रविवार 17 अगस्त को मनाया जाएगा।
गुग्गा नवमी का त्योहार देश के कई राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़ और विशेष रूप से राजस्थान में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। राजस्थान में यह एक प्रमुख लोकपर्व है, जिसे गुग्गा नवमी या गोगा नवमी के नाम से जाना जाता है। इस बार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि 17 अगस्त को पड़ रही है, जिसे गुग्गा नवमी के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन नागों की पूजा होती है। मान्यता है कि वीर जाहरवीर अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
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