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बचपन से बुढ़ापे तक हमारा कहीं नियंत्रण नहीं : अतुल कृष्ण
Tue, 13 May 2025 05:32 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Tue, 13 May 2025 05:32 AM IST
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सलोह कुटिया आश्रम ऊना में श्रीमद्भागवत का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
ऊना। सलोह कुटिया आश्रम ऊना में श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन स्वामी अतुल कृष्ण महाराज ने कहा कि पहले बचपन और फिर जवानी चली आती है। फिर बुढ़ापा आ जाता है। इन सभी के बीच हमारा नियंत्रण कहीं नहीं, फिर भी हम अपने को माने बैठे हैं। हम कहे चले जाते हैं कि मैं जवान हूं, मैं बूढ़ा हूं। जैसे कि जवानी कुछ हम पर निर्भर हो। गुलाब का पौधा नहीं कह सकता कि मैं गुलाब के फूल खिलाता हूं। क्योंकि यह तभी कह सकता था, जब चमेली के फूल खिला सकता होता। लेकिन चमेली के तो खिला नहीं पाता। चंपा के तो खिला नहीं पाता।
अतुल कृष्ण महाराज ने कहा कि प्रकृति में कुछ छोटे पौधे और कुछ बड़े, परंतु इनमें कभी विवाद नहीं सुना गया। इनमें कोई झगड़ा नहीं हुआ। छोटे पौधे ने कभी बड़े पौधे से नहीं पूछा कि तू बड़ा क्यों है। छोटा अपने छोटे होने में शांत है। बड़े ने कभी छोटे से नहीं पूछा कि तू छोटा क्यों है। परमात्मा की इच्छा से अपनी इच्छा को मिला देना सबसे बड़ी साधना है। सोमवार को कथा के दौरान लोगों ने यज्ञ भगवान का प्राकट्य, भगवान शिव-पार्वती का विवाह, ध्रुव की तपस्या एवं जड़ भरत का प्रसंग अत्यंत श्रद्धा से सुना। इस अवसर पर परम पूज्य स्वामी महेशानंद जी महाराज ने भी अपने प्रवचनों से संगत को निहाल किया।
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ऊना। सलोह कुटिया आश्रम ऊना में श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन स्वामी अतुल कृष्ण महाराज ने कहा कि पहले बचपन और फिर जवानी चली आती है। फिर बुढ़ापा आ जाता है। इन सभी के बीच हमारा नियंत्रण कहीं नहीं, फिर भी हम अपने को माने बैठे हैं। हम कहे चले जाते हैं कि मैं जवान हूं, मैं बूढ़ा हूं। जैसे कि जवानी कुछ हम पर निर्भर हो। गुलाब का पौधा नहीं कह सकता कि मैं गुलाब के फूल खिलाता हूं। क्योंकि यह तभी कह सकता था, जब चमेली के फूल खिला सकता होता। लेकिन चमेली के तो खिला नहीं पाता। चंपा के तो खिला नहीं पाता।
अतुल कृष्ण महाराज ने कहा कि प्रकृति में कुछ छोटे पौधे और कुछ बड़े, परंतु इनमें कभी विवाद नहीं सुना गया। इनमें कोई झगड़ा नहीं हुआ। छोटे पौधे ने कभी बड़े पौधे से नहीं पूछा कि तू बड़ा क्यों है। छोटा अपने छोटे होने में शांत है। बड़े ने कभी छोटे से नहीं पूछा कि तू छोटा क्यों है। परमात्मा की इच्छा से अपनी इच्छा को मिला देना सबसे बड़ी साधना है। सोमवार को कथा के दौरान लोगों ने यज्ञ भगवान का प्राकट्य, भगवान शिव-पार्वती का विवाह, ध्रुव की तपस्या एवं जड़ भरत का प्रसंग अत्यंत श्रद्धा से सुना। इस अवसर पर परम पूज्य स्वामी महेशानंद जी महाराज ने भी अपने प्रवचनों से संगत को निहाल किया।
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