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Una News: अलोह के फिरोज खान नहीं भूले पुश्तैनी हुनर
Thu, 10 Sep 2026 12:11 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Thu, 10 Sep 2026 12:11 AM IST
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ऊना। आधुनिकता के इस दौर में जहां खेती के अधिकांश काम मशीनों के सहारे होने लगे हैं, वहीं चिंतपूर्णी विधानसभा क्षेत्र के अलोह गांव निवासी फिरोज खान आज भी अपनी सदियों पुरानी कृषि परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं।
मक्की की कटाई के सीजन के लिए वह आज भी अपने हाथों से बगड़ घास की रस्सियां तैयार कर फसल को संभालते हैं। फिरोज खान बताते हैं कि जब से उन्होंने होश संभाला है, तब से वह इसी पारंपरिक तरीके से बगड़ घस की रस्सियां बनाते आ रहे हैं।
उनके लिए यह महज खेती का काम नहीं बल्कि उनके बुजुर्गों से मिली पुश्तैनी विरासत और ग्रामीण जीवन की पहचान है। कभी गांवों में मक्की की कटाई के दौरान बगड़ घास की रस्सियां बनाना आम बात हुआ करती थी।
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खेतों में किसान और परिवार के सदस्य मिलकर रस्सियां तैयार करते और इसी के सहारे फसल को संभालने का काम करते थे, लेकिन समय बदला और खेती में आधुनिक तकनीक व मशीनों का चलन बढ़ता गया। इसके साथ ही ऐसे पारंपरिक हुनर भी धीरे-धीरे कम होते चले गए।
अब दुकानों पर मशीनों से तैयार रस्सियां मौजूद हैं। ऐसे समय में फिरोज खान का आज भी अपने हाथों से बगड़ की रस्सियां तैयार करना पुरानी यादों को ताजा करने के साथ-साथ हमारी कृषि संस्कृति को भी जीवंत करता है।
उनका कहना है कि आधुनिक साधनों का अपना महत्व है, लेकिन अपनी पुरानी परंपराओं और हुनर को भूलना नहीं चाहिए। अलोह में मक्की के कटाई कार्य के लिए फिरोज खान को बगड़ की रस्सियां तैयार करते देख ग्रामीण भी पुराने समय को याद कर रहे हैं।
बदलते दौर में उनका यह प्रयास नई पीढ़ी के लिए संदेश देता है कि तरक्की के साथ अपनी जड़ों और पुश्तैनी हुनर को संभालकर रखना भी जरूरी है।
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मक्की की कटाई के सीजन के लिए वह आज भी अपने हाथों से बगड़ घास की रस्सियां तैयार कर फसल को संभालते हैं। फिरोज खान बताते हैं कि जब से उन्होंने होश संभाला है, तब से वह इसी पारंपरिक तरीके से बगड़ घस की रस्सियां बनाते आ रहे हैं।
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उनके लिए यह महज खेती का काम नहीं बल्कि उनके बुजुर्गों से मिली पुश्तैनी विरासत और ग्रामीण जीवन की पहचान है। कभी गांवों में मक्की की कटाई के दौरान बगड़ घास की रस्सियां बनाना आम बात हुआ करती थी।
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खेतों में किसान और परिवार के सदस्य मिलकर रस्सियां तैयार करते और इसी के सहारे फसल को संभालने का काम करते थे, लेकिन समय बदला और खेती में आधुनिक तकनीक व मशीनों का चलन बढ़ता गया। इसके साथ ही ऐसे पारंपरिक हुनर भी धीरे-धीरे कम होते चले गए।
अब दुकानों पर मशीनों से तैयार रस्सियां मौजूद हैं। ऐसे समय में फिरोज खान का आज भी अपने हाथों से बगड़ की रस्सियां तैयार करना पुरानी यादों को ताजा करने के साथ-साथ हमारी कृषि संस्कृति को भी जीवंत करता है।
उनका कहना है कि आधुनिक साधनों का अपना महत्व है, लेकिन अपनी पुरानी परंपराओं और हुनर को भूलना नहीं चाहिए। अलोह में मक्की के कटाई कार्य के लिए फिरोज खान को बगड़ की रस्सियां तैयार करते देख ग्रामीण भी पुराने समय को याद कर रहे हैं।
बदलते दौर में उनका यह प्रयास नई पीढ़ी के लिए संदेश देता है कि तरक्की के साथ अपनी जड़ों और पुश्तैनी हुनर को संभालकर रखना भी जरूरी है।