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विदेशी परिंदों से गुलजार हुए क्षेत्र के कई जलाशय
Updated Sun, 11 Feb 2018 06:48 PM IST
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विदेशी परिंदों से गुलजार क्षेत्र के जलाशय
ट्रांस हिमालयी क्षेत्रों से पहुंचे हजारों विदेशी मेहमान, रास आई स्वां और सतलुज की आबोहवा
फरवरी माह में होगी विदेशी मेहमानों की गणना, परिंदों की अठखेलियां देखने उमड़ रहे लोग
पंकज चब्बा
संतोषगढ़ (ऊना)।
ट्रांस हिमालयी देशों से हजारों मील का सफर तय कर प्रदेश की गोविंद सागर झील और शिवालिक पर्वत श्रृंखला की तलहटी के क्षेत्र ब्रह्मोती से सटे नंगल वेटलैंड क्षेत्र इन दिनों विदेशी मेहमानों की आमद से गुलजार है। साइबेरिया, ट्रांस हिमालयी क्षेत्रों, चीन, मध्य एशियाई देशों के साथ-साथ दूसरे कई देशों से शीतकाल प्रवास पर सूबे की पौंग झील, गोविंद सागर झील, पंडोह डैम पहुंचने वाले विदेशी मेहमानों को अब स्वां नदी के तटवर्ती जलाशय, ब्रह्मोती हंडोला से नंगल पंजाब वेटलैंड तक फैली सतलुज झील भी भा रही है। सतलुज झील में हजारों विदेशी परिंदे पहुंच चुके हैं। हर साल अक्तूबर और नवंबर में विदेशी परिंदे साइबेरिया और मध्य एशिया के ठंडे इलाकों में भारी बर्फ पड़ने के बाद उड़ कर देश के कई हिस्सों में पहुंचते हैं। विदेशी परिंदे क्षेत्र के कई स्थानों पर डेरा जमा रहे हैं। कम सर्दी वाले और पर्याप्त भोजन व्यवस्था वाले इलाकों में तीन-चार महीने का समय गुजारने के बाद विदेशी मेहमान मौसम गर्माने के साथ अपने वतन लौट जाते हैं। स्वां नदी के साथ सटे कई जलाशयों और सतलुज झील के कई किलोमीटर क्षेत्र में डेरा डालने वाले विदेशी मेहमानों में रूढ़िशैलडक, बारहेडेड़, ग्रूस, पॉचर्ड, ग्रैएलग्रीस, कूट्स, डक्स, मैलारड, मूरहैंस, स्वोट्स बिल डक्स सहित कई प्रजातियां शामिल हैं। सतलुज के तट पर उगते और डूबते सूरज की लालिमा के बीच मेहमान परिंदों की गूंज और अटखेलियों का विहंगम दृश्य हर किसी को लुभा रहा है।
जागृति संस्था के निदेशक एवं वाइल्ड बर्ड वाचर प्रभात भट्टी का कहना है कि संतोषगढ़ के स्वां में विभिन्न जलाशयों के साथ-साथ सतलुज झील के मुहाने पर हजारों विदेशी परिंदे पहुंच रहे हैं। हजारों की तादाद में विदेशी परिंदे गोविंद सागर की झील में पहुंच चुके हैं। इनकी गणना का काम फरवरी में विभाग और स्थानीय संस्था के सदस्य करेंगे। भट्टी का कहना है कि ट्रांस हिमालयी क्षेत्रों से आने वाले इन पक्षियों को जिस जगह पर्याप्त भोजन मिलता है, वहां पर ये परिंदे अपना डेरा जमाते हैं। लंबी दूरी की यात्रा होने से कई बार पक्षी जलाशयों और छोटी नदियों के मुहानों पर भी कुछ समय के लिए रुक जाते हैं।
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ट्रांस हिमालयी क्षेत्रों से पहुंचे हजारों विदेशी मेहमान, रास आई स्वां और सतलुज की आबोहवा
फरवरी माह में होगी विदेशी मेहमानों की गणना, परिंदों की अठखेलियां देखने उमड़ रहे लोग
पंकज चब्बा
संतोषगढ़ (ऊना)।
ट्रांस हिमालयी देशों से हजारों मील का सफर तय कर प्रदेश की गोविंद सागर झील और शिवालिक पर्वत श्रृंखला की तलहटी के क्षेत्र ब्रह्मोती से सटे नंगल वेटलैंड क्षेत्र इन दिनों विदेशी मेहमानों की आमद से गुलजार है। साइबेरिया, ट्रांस हिमालयी क्षेत्रों, चीन, मध्य एशियाई देशों के साथ-साथ दूसरे कई देशों से शीतकाल प्रवास पर सूबे की पौंग झील, गोविंद सागर झील, पंडोह डैम पहुंचने वाले विदेशी मेहमानों को अब स्वां नदी के तटवर्ती जलाशय, ब्रह्मोती हंडोला से नंगल पंजाब वेटलैंड तक फैली सतलुज झील भी भा रही है। सतलुज झील में हजारों विदेशी परिंदे पहुंच चुके हैं। हर साल अक्तूबर और नवंबर में विदेशी परिंदे साइबेरिया और मध्य एशिया के ठंडे इलाकों में भारी बर्फ पड़ने के बाद उड़ कर देश के कई हिस्सों में पहुंचते हैं। विदेशी परिंदे क्षेत्र के कई स्थानों पर डेरा जमा रहे हैं। कम सर्दी वाले और पर्याप्त भोजन व्यवस्था वाले इलाकों में तीन-चार महीने का समय गुजारने के बाद विदेशी मेहमान मौसम गर्माने के साथ अपने वतन लौट जाते हैं। स्वां नदी के साथ सटे कई जलाशयों और सतलुज झील के कई किलोमीटर क्षेत्र में डेरा डालने वाले विदेशी मेहमानों में रूढ़िशैलडक, बारहेडेड़, ग्रूस, पॉचर्ड, ग्रैएलग्रीस, कूट्स, डक्स, मैलारड, मूरहैंस, स्वोट्स बिल डक्स सहित कई प्रजातियां शामिल हैं। सतलुज के तट पर उगते और डूबते सूरज की लालिमा के बीच मेहमान परिंदों की गूंज और अटखेलियों का विहंगम दृश्य हर किसी को लुभा रहा है।
जागृति संस्था के निदेशक एवं वाइल्ड बर्ड वाचर प्रभात भट्टी का कहना है कि संतोषगढ़ के स्वां में विभिन्न जलाशयों के साथ-साथ सतलुज झील के मुहाने पर हजारों विदेशी परिंदे पहुंच रहे हैं। हजारों की तादाद में विदेशी परिंदे गोविंद सागर की झील में पहुंच चुके हैं। इनकी गणना का काम फरवरी में विभाग और स्थानीय संस्था के सदस्य करेंगे। भट्टी का कहना है कि ट्रांस हिमालयी क्षेत्रों से आने वाले इन पक्षियों को जिस जगह पर्याप्त भोजन मिलता है, वहां पर ये परिंदे अपना डेरा जमाते हैं। लंबी दूरी की यात्रा होने से कई बार पक्षी जलाशयों और छोटी नदियों के मुहानों पर भी कुछ समय के लिए रुक जाते हैं।
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