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जयंती विशेषः नेताजी ने हिमाचल में भी बिताया था ‘अज्ञातवास’

Wed, 23 Jan 2013 12:31 AM IST
शिमला/सुनील चड्ढा
शिमला/सुनील चड्ढा Updated Wed, 23 Jan 2013 12:31 AM IST
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subhash chandra bose lived underground in himachal pradesj

सिविल सर्विस की आरामदायक नौकरी को ठोकर मारने के बाद ‘जय हिंद’ का नारा देकर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला देने वाले भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक सुभाष चंद्र बोस (जन्मः 23 जनवरी 1897) का हिमाचल से गहरा नाता रहा है। वर्ष 1937 में मई महीने की शुरुआत में सुभाष चंद्र बोस ने डलहौजी में सात महीने गुप्त रूप से बिताए।

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डलहौजी आने से पहले ब्रिटिश हुकूमत ने सुभाष को जेल में डाल दिया था। यहां उनका स्वास्थ्य तेजी से गिर रहा था। परिवार के आग्रह पर और बिगड़ती हालत के चलते ब्रिटिश हाईकोर्ट ने ‘नेताजी’ को पैरोल पर रिहा कर दिया। इसके बाद सुभाष चंद्र बोस ने इंग्लैंड के अपने छात्र जीवन के मित्र डॉ. धर्मवीर और उनकी पत्नी के पास डलहौजी जाने का फैसला किया। उन दिनों डलहौजी उत्तर भारत का प्रसिद्ध आरोग्य-स्थल था। सात महीने बाद ‘नेताजी’ डलहौजी से बिल्कुल स्वस्थ होकर लौटे।
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काइनांस इस्टेट मूलतया लाहौर के रहने वाले डॉ. एनआर धर्मवीर का निजी बंगला था। यह बंगला उन्होंने 1933 में बनवाया था। यह भवन विश्वविख्यात हो गया जब यहां 1937 में सुभाष चंद्र बोस ने सात माह गुप्त रूप से बिताए। काइनांस इस्टेट बंगले तक गांधी चौक से पंजपूला रोड पर करीब पांच मिनट पैदल चलकर पहुंचा जा सकता है। यह बंगला अब दिल्ली के किसी व्यक्ति ने खरीद लिया है।
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स्थानीय लोग कहते हैं कि बंगले में बोस का बिस्तर और उनके द्वारा इस्तेमाल किया गया सामान आज भी मौजूद हैं। राज्य अभिलेखागार के सहायक निदेशक प्रेम प्रसाद पंडित ने बताया कि राज्य अभिलेखागार में सुभाष चंद्र बोस के बारे में अभिलेख तो उपलब्ध नहीं हैं लेकिन राष्ट्रीय अभिलेखागार में भारत सरकार (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय) द्वारा मुद्रित 84 खंडों जो देशभक्तों के विषयों से जुड़ी पुस्तकें निकाली हैं में नेताजी के बारे में सूचनाएं उपलब्ध हैं। इनमें प्रमाणित सूचनाएं प्राप्त हैं। इनमें सुभाष चंद्र बोस जी के डलहौजी आगमन की जानकारी उपलब्ध है।

डलहौजी शहर का नाम सुभाष नगर कब पड़ेगा?
स्वतंत्रता संग्राम के महानायक सुभाष चंद्र बोस की याद में हिमाचल सरकार डलहौजी में आज तक न तो कोई संग्रहालय खोल पाई है और न ही डलहौजी का नामकरण सुभाष नगर हो पाया। पुख्ता सूत्रों के अनुसार तत्कालीन सरकार के समय डलहौजी का नाम सुभाष नगर रखने की कवायद वाली फाइल सचिवालय से भाषा एवं संस्कृति विभाग के माध्यम से संबंधित विभाग को भेजी गई थी।


अभी तक इस फाइल पर क्या कार्रवाई हुई, इसकी कोई सूचना नहीं लग पाई है। सेवानिवृत्त जिला भाषा अधिकारी चंबा प्रेम शर्मा कहते हैं कि डलहौजी का नाम सुभाष नगर रखने को लेकर तत्कालीन सरकार से 2010 के आसपास पत्राचार हुआ था। सरकार ने लोगों की राय मांगी थी। डलहौजी के वरिष्ठ और प्रबुद्ध लोगों के साथ बैठकें हुईं।

नामकरण पर लोग तो सहमत थे पर होटल मालिक सहमत नहीं थे। इसके बाद रिपोर्ट उपायुक्त को भेज दी गई थी। इसके बाद क्या कार्रवाई हुई, पता नहीं चला।

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