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Solan News: लोक संस्कृति, आस्था और पर्यटन का केंद्र बना बाड़ीधार
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जिला स्तरीय दर्जा मिलने से बढ़ी बाड़ीधार मेले की पहचान, 14-15 जून को जुटेंगे हजारों श्रद्धालु
रतजगा, भजन-कीर्तन और धार्मिक परंपराएं होंगी मुख्य आकर्षण
राजेश गुप्ता
दाड़लाघाट(सोलन)। अर्की उपमंडल की पहाड़ियों के बीच स्थित बाड़ीधार धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की लोक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत केंद्र भी है। 14 और 15 जून को आषाढ़ मास की संक्रांति पर यहां होने वाला बाड़ीधार मेला हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
अर्की से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित बाड़ीधार मनोरम प्राकृतिक दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। चारों ओर फैली हरियाली, ऊंची पहाड़ियां और शांत वातावरण यहां आने वाले लोगों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराते हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां विराजमान बाड़ा देव भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। इसके चलते लोग दूर-दूर से यहां माथा टेकने आते हैं।
बाड़ीधार से जुड़ी कई लोक कथाएं और मान्यताएं भी प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, अंग्रेजों ने कभी इस स्थान को अपनी राजधानी बनाने का प्रयास किया था, लेकिन मधुमक्खियों के हमले के कारण उन्हें निर्णय बदलना पड़ा। यह कथा आज भी क्षेत्र में लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। मेले की पूर्व संध्या पर होने वाला रतजगा भी विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। पूरी रात भजन-कीर्तन, ढोल-नगाड़ों और धार्मिक अनुष्ठानों से बाड़ीधार का वातावरण भक्तिमय बना रहता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार मेले के दिन से अधिक भीड़ रतजगे वाली रात को देखने को मिलती है।
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हाल ही में प्रदेश सरकार द्वारा बाड़ीधार मेले को जिला स्तरीय मेले का दर्जा दिए जाने से इसकी पहचान और अधिक बढ़ गई है। लोगों को उम्मीद है कि इससे क्षेत्र के धार्मिक पर्यटन, संस्कृति और स्थानीय व्यापार को नया आयाम मिलेगा।
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रतजगा, भजन-कीर्तन और धार्मिक परंपराएं होंगी मुख्य आकर्षण
राजेश गुप्ता
दाड़लाघाट(सोलन)। अर्की उपमंडल की पहाड़ियों के बीच स्थित बाड़ीधार धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की लोक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत केंद्र भी है। 14 और 15 जून को आषाढ़ मास की संक्रांति पर यहां होने वाला बाड़ीधार मेला हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
अर्की से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित बाड़ीधार मनोरम प्राकृतिक दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। चारों ओर फैली हरियाली, ऊंची पहाड़ियां और शांत वातावरण यहां आने वाले लोगों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराते हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां विराजमान बाड़ा देव भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। इसके चलते लोग दूर-दूर से यहां माथा टेकने आते हैं।
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बाड़ीधार से जुड़ी कई लोक कथाएं और मान्यताएं भी प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, अंग्रेजों ने कभी इस स्थान को अपनी राजधानी बनाने का प्रयास किया था, लेकिन मधुमक्खियों के हमले के कारण उन्हें निर्णय बदलना पड़ा। यह कथा आज भी क्षेत्र में लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। मेले की पूर्व संध्या पर होने वाला रतजगा भी विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। पूरी रात भजन-कीर्तन, ढोल-नगाड़ों और धार्मिक अनुष्ठानों से बाड़ीधार का वातावरण भक्तिमय बना रहता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार मेले के दिन से अधिक भीड़ रतजगे वाली रात को देखने को मिलती है।
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हाल ही में प्रदेश सरकार द्वारा बाड़ीधार मेले को जिला स्तरीय मेले का दर्जा दिए जाने से इसकी पहचान और अधिक बढ़ गई है। लोगों को उम्मीद है कि इससे क्षेत्र के धार्मिक पर्यटन, संस्कृति और स्थानीय व्यापार को नया आयाम मिलेगा।