यहां मुसलिम के हाथों से बने रावण के पुतले का दहन करते हैं भगवान श्रीराम
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राम ही रहीम है और रहीम ही राम है। दोनों नामों में फर्क करेंगे तो नफरत बढ़ेगी और दोनों नामों को एक समझेंगे तो अमन और शांति होगी। धर्म के नाम पर किसी भी मजहब के लोग अगर नफरत फैलाने का कार्य करते हैं तो वह गलत है। भारत में रहने वाला किसी भी धर्म का क्यों न हो वह पहले हिंदुस्तानी है। सरहद पर हिंदू ही नहीं मुसलमान सैनिक भी देश की रक्षा करने में पीछे नहीं हैं। सोलन में मुस्लिम समुदाय के कारीगर हिंदुओं के प्रमुख दशहरा त्योहार में धू धू कर जलने वाले बुराई के प्रतीक रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों को अपने हाथ से रूप दे कर कुछ इस तरह का एकता और भाईचारे का संदेश दे रहे हैं।
सोलन में बुराई के प्रतीकों का पुतला बनाने वाले यूपी सहारनपुर के मुख्य कारीगर मोहम्मद शाह नवाज भी यही सोच रखते हैं। दो सप्ताह से वह ठोडो ग्राउंड में कारीगर शरीक नवाज, अनीस नवाज, अरशद खान, फिरोज, परवेज, निशाद और अली अजगर के साथ भाईचारे का संदेश देते हुए पुतले बना रहे हैं। इनके मुताबिक भारत और पाकिस्तान को समझना होगा कि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं। एकजुटता में एकता है। लिहाजा दोनों मुल्कों को कौम और खुद के विकास के लिए दोस्ती का रास्ता अपनाना चाहिए।
1979 में शुरू किया पुतले बनाना
मोहम्मद शाह नवाज ने बताया कि वर्ष 1979 में उन्होंने अपने बड़े भाई बरकत अली के कहने पर उनके साथ शिमला के जाखू मंदिर में रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के पुतलेे बनाने का कार्य शुरू किया। उन्होंने 7 सालों तक अपने बड़े भाई के साथ रहकर शिमला में इन पुतलों को बनाने का कार्य सीखा। इसके बाद साल 1986 में उन्हें सोलन में रावण के पुतला बनाने का कार्य मिला। इसके बाद से वह हर साल पुतले का निर्माण कर रहे हैं। अब उनके दो बेटे भी उनके साथ यह कार्य कर रहे हैं। मेघनाथ के पुतले की लंबाई 35 फीट, कुंभकरण 40 और रावण की सबसे ऊंचा 45 फीट पुतला है।
दो माह पूर्व शुरू होता है कार्य
दशहरे से दो माह पूर्व ही कारीगर पुतले बनाने के लिए सोलन आ जाते हैं। फिर एक-एक कर रावन, मेघनाथ और कुंभकरण के पुतलों को बनाया जाता है। फिर ठीक दशहरे वाले दिन इन पुतलों को जोड़ने का कार्य किया जाता था। इसमें काफी परेशानी होती थी। लेकिन अब ऐसा नही है। तीनों पुतलों के ढांचे को वह सहारनपुर से ही तैयार करके लाते हैं।
फिर बनने लगे मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले
ठोड़ो ग्राउंड में पहले केवल रावण का पुतला ही बनाया और जलाया जाता था। इसकी ऊंचाई मात्र 25 फीट होती थी। मोहम्मद-शाह-नवाज ने बताया कि उनके कहने पर साल 2000 से नप ने मेघनाथ और कुंभकरण के पुतले ठोडो ग्राउंड में बनने शुरू किए।