{"_id":"5795fde64f1c1b890221e04e","slug":"memory-of-kargil","type":"story","status":"publish","title_hn":"सीने पर गोली खाने वालों के नाम की घोषणाएं अभी तक अधूरी ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सीने पर गोली खाने वालों के नाम की घोषणाएं अभी तक अधूरी
ब्यूरो/अमर उजाला, सोलन
Updated Tue, 26 Jul 2016 11:06 AM IST
विज्ञापन
कारगिल से पाक फौज को खदेड़ने में सीने में गोली खाकर शहादत का जाम पीने वाले शहीद धर्मेंद्र के नाम पर आज तक कुछ घोषणाएं पूरी नहीं हो सकीं।
- फोटो : demo pic
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कारगिल से पाक फौज को खदेड़ने में सीने में गोली खाकर शहादत का जाम पीने वाले शहीद धर्मेंद्र के नाम पर आज तक कुछ घोषणाएं पूरी नहीं हो सकीं। महज 20 वर्ष में ही उन्होंने अपनी जिंदगी वतन के नाम लिख दी। हालांकि उनके नाम का पेट्रोल पंप और स्थानीय उच्च विद्यालय का नाम शहीद के नाम को गौरवान्वित कर रहा है।
विज्ञापन
लेकिन वर्ष 2004 में उनके पैतृक गांव बुघार कनैता में आयुर्वेदिक केंद्र खोलने की कवायद और भाट् की हट्टी कुठाड़ संपर्क मार्ग का नाम शहीद के नाम पर नहीं हो सका है। शहीद धर्मेंद्र सिंह कसौली तहसील के बुघार कनैता के रहने वाले थे। उनका जन्म 26 जनवरी 1979 को हुआ।
विज्ञापन
चंडी में वर्ष 1996 में उन्होंने जमा दो की परीक्षा दी और बीआरओ के माध्यम से डायरेक्ट सेना में भर्ती हुए। शहीद के पिता नरपत सिंह ने बताया कि सरकार से उन्हें काफी सुविधाएं दी हैं। लेकिन आयुर्वेदिक केंद्र और लिंक रोड का नाम उनके शहीद बेटे के नाम होने की घोषणाएं अधूरी हैं।
विज्ञापन
कहा कि उन्हें अपने बेटे की कुर्बानी पर गर्व है। लेकिन कभी भी उनके बेटे की शहादत को याद करते हुए उनके सम्मान में दो मिनट का मौन नहीं रखा जाता। उन्होंने अपने दम पर गांव में शहीद पुत्र का बुत बनवाया है, ताकि युवा शहादत को याद रख सकें।
सीने पर खाई थी गोली
कुनिहार (सोलन)। धर्मेंद्र पंजाब रेजिमेंट में थे। उनकी पोस्टिंग कारगिल में थी। 30 जून 1999 को यह वीर सिपाही विजय कार्रवाई के दौरान दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गया। पंजाब रेजिमेंट के नायक कुलदीप सिंह शहीद का पार्थिव शरीर उनके घर छोड़ने आए थे।
उन्होंने बताया था कि बटालिक सेक्टर तीन पंजाब रेजिमेंट में घुसपैठियों ने धावा बोला था। इसी दौरान पोजिशन बदलते वक्त गोली धर्मेंद्र की छाती में लगी। 3 जुलाई 1999 को उनका पार्थिव शरीर गंभर नदी के किनारे पूरे राजकीय और सैनिक सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन हो गया।