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शहीद के पैतृक गांव में 22 साल से नहीं खुली डिस्पेंसरी

Sun, 25 Jul 2021 11:36 PM IST
Shimla	 Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 25 Jul 2021 11:36 PM IST
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Bughar Kanaita martyr's ancestral village not given dispensary even after 22 years
बुघार कनैता में बनी शहीद धर्मेंद्र सिंह की प्रतिमा। संवाद - फोटो : SOLAN
शहीद के पैतृक गांव में 22 साल से नहीं खुली डिस्पेंसरी
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असाइनमेंट : पिता ने सरकार को कई बार लिखे पत्र, मुख्समंत्री से भी मिले
20 वर्ष की आयु में शहीद हो गए थे बुघार कनैता के धर्मेंद्र
संवाद न्यूज एजेंसी
सोलन। कारगिल युद्ध में शहादत पाने वाले शहीद धर्मेंद्र सिंह के नाम से 22 वर्ष बाद भी पैतृक गांव में आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी नहीं खुली है। इसके लिए शहीद के पिता आज भी सरकार की राह देख रहे हैं। हालांकि, शहीद के पिता नरपत सिंह इस मांग को पूरा करने के लिए सरकारों और मंत्रियों से मिल चुके हैं। बाकायदा उन्होंने कांग्रेस-भाजपा सरकार को भी पत्र लिखे हैं लेकिन ये मांग पूरी नहीं हो पाई। जानकारी के अनुसार महज 20 वर्ष में ही बुघार कनैता के धर्मेंद्र सिंह ने अपनी जिंदगी वतन के नाम लिख दी थी। हालांकि, उनके नाम का पेट्रोल पंप और स्थानीय उच्च विद्यालय का नाम गौरवान्वित कर रहा है। विद्यालय में शहीद धर्मेंद्र सिंह के नाम की प्रतिमा भी लगाई है ताकि युवा शहादत को याद रखें। यहां पर शहीदी दिवस, कारगिल दिवस, 26 जनवरी और 15 अगस्त पर उन्हें याद किया जाता है। गांव के लोग इस दौरान फूल-माला और पुष्प अर्पित करते है। शहीद धर्मेंद्र के पिता नरपत सिंह ने बताया कि 2004 में उनके पैतृक गांव बुघार कनैता में आयुर्वेदिक केंद्र खोलने की कवायद अभी तक शुरू नहीं हो सकी है। शहीद धर्मेंद्र सिंह कसौली तहसील के बुघार कनैता के रहने वाले थे। उनका जन्म 26 जनवरी 1979 को हुआ।
बेटे की कुर्बानी पर है गर्व
चंडी में वर्ष 1996 में उन्होंने जमा दो की परीक्षा दी और बीआरओ के माध्यम से डायरेक्ट सेना में भर्ती हुए। शहीद के पिता नरपत सिंह ने बताया कि सरकार ने उन्हें काफी सुविधाएं दी लेकिन उनके नाम से आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी खोलने की मांग अधूरी है। पैतृक गांव में शहीद के नाम से आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी खुलने से लोगों को काफी फायदा होना था। उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की कि गांव में शहीद के नाम से आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी को खोला जाए।
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सीने पर खाई थी गोली
शहीद धर्मेंद्र सिंह देशसेवा करते हुए कारगिल युद्ध में 30 जून 1999 को शहीद हो गए थे। पिता का कहना है कि जब बेटा शहीद हुआ, उस वक्त उनसे मिले हुए सात माह हो चुके थे। उस समय फोन पर बात नहीं होती थी बल्कि पत्र लिखकर ही संदेश पहुंचाया जाता था। उन्होंने बताया था कि बटालिक सेक्टर तीन पंजाब रेजिमेंट में घुसपैठियों ने धावा बोला था। इसी दौरान पोजिशन बदलते समय गोली धर्मेंद्र की छाती में लगी। तीन जुलाई 1999 को उनका पार्थिव शरीर सैनिक सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन हो गया।
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