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फोरलेन निर्माता कंपनी के पास नहीं डंपिंग साइट
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सोलन। चंबाघाट से कैथलीघाट तक फोरलेन के दूसरे चरण का निर्माण कार्य चल रहा है। लेकिन, वन विभाग का अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं मिला है। इसकी वजह से करीब 25 किलोमीटर के इस हिस्से में निर्माता कंपनी के पास मलबा फेंकने की कोई जगह नहीं है। इन हालात में फोरलेन के दूसरे चरण का निर्माण कभी भी बंद हो सकता है।
कंपनी की तरफ से अभी तक अनुमति के लिए फाइल वन विभाग के कार्यालय नहीं पहुंची है। वन विभाग के पास फाइल आने के बाद इसे स्वीकृति के लिए केंद्रीय मंत्रालय को भेजा जाएगा और इसके बाद ही काम शुरू हो सकता है। कंपनी ने शुरुआती चरण में डेढ़घराट के समीप पहाड़ खोदने का काम शुरू किया है। लेकिन जिस निजी डंपिंग साइट पर मलबा फेंका जा रहा था वो अब भर चुकी है। इसकी वजह से अब काम बंद करने की नौबत आ गई है। टेंडर के अनुसार कंपनी को 30 माह में फोरलेन का निर्माण कार्य पूरा करना है। छह माह में उन्हें कुल कार्य का करीब बीस प्रतिशत काम करना होगा। इस कार्य की जांच के लिए बाकायदा टीमें गठित की गई हैं जो हर छह माह के अंतराल में कंपनी की ओर से किए गए कार्य का आकलन करेंगी। यदि निर्धारित समय में कार्य पूरा नहीं हो पाता है तो इसके लिए एनएचएआई प्रबंधन कंपनी पर जुर्माना लगा सकता है। जिस डंपिंग साइट को कंपनी ने निजी तौर पर लिया था वो पूरी तरह से भर गई है और मलबा सड़क तक पहुंच रहा है। इससे शिमला-चंडीगढ़ मार्ग पर कई बार यातायात भी बाधित हुआ है। फिलहाल डंपिंग साइट का मसला कंपनी व एनएचएआई प्रबंधन के गले की फांस बन गया है और इस पूरे प्रकरण में वन विभाग की अनुमति इस पूरे प्रकरण की जड़ हैै। कंपनी ने पहाड़ को कई जगह से खोदना शुरू कर दिया था। लेकिन अब यहां काम को रोकना पड़ रहा है। लगातार बारिश की वजह से पहाड़ पर लटक रहा मलबा भी कालका-शिमला मार्ग पर दौड़ रहे वाहनों के लिए नया खतरा बना हुआ है।
वन मंडल अधिकारी सोलन आरएस जसवाल का कहना है कि कंपनी या एनएचएआई की तरफ से कोई भी प्रस्ताव विभाग के पास नहीं आया है। यदि कंपनी को वन विभाग की जमीन पर मलबा फेंकना है तो इसके लिए स्वीकृति लेनी होगी। प्रस्ताव आने के बाद करीब एक माह में विभाग की ओर से स्वीकृति पत्र कंपनी को प्रदान किए जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि बिना स्वीकृति कंपनी को वन विभाग की जमीन पर मलबा फेंकने की इजाजत नहीं मिलेगी।
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एसडीएम कंडाघाट संजीव धीमान का कहना है कि कंपनी प्रबंधन की ढील की वजह से डंपिंग साइट चयनित नहीं हो पा रही है। कंपनी प्रबंधन साइट हासिल करने में तेजी दिखाए तो यह काम जल्द हो सकता है। उन्होंने बताया कि कंपनी बिना अनुमति के राजस्व विभाग की जमीन पर मलबा फेंकती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। कंपनी को इस हरकत के लिए जुर्माना भुगतना पड़ेगा।
कंपनी के साइट प्रबंधक अमित मलिक का कहना है कि प्रशासन, एनएचएआई प्रबंधन व वन विभाग के संपर्क में हैं और मंजूरी के लिए प्रस्ताव भी दे रखा है। इसके बावजूद उन्हें अनुमति नहीं मिल पाई है। इसकी वजह से काम में देरी हो रही है। उन्होंने बताया कि यही चलता रहा तो कंपनी तय समय में निर्माण पूरा नहीं कर पाएगी और ऐसा होता है तो उसके लिए अकेले निर्माता कंपनी को दोषी नहीं माना जाना चाहिए।
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कंपनी की तरफ से अभी तक अनुमति के लिए फाइल वन विभाग के कार्यालय नहीं पहुंची है। वन विभाग के पास फाइल आने के बाद इसे स्वीकृति के लिए केंद्रीय मंत्रालय को भेजा जाएगा और इसके बाद ही काम शुरू हो सकता है। कंपनी ने शुरुआती चरण में डेढ़घराट के समीप पहाड़ खोदने का काम शुरू किया है। लेकिन जिस निजी डंपिंग साइट पर मलबा फेंका जा रहा था वो अब भर चुकी है। इसकी वजह से अब काम बंद करने की नौबत आ गई है। टेंडर के अनुसार कंपनी को 30 माह में फोरलेन का निर्माण कार्य पूरा करना है। छह माह में उन्हें कुल कार्य का करीब बीस प्रतिशत काम करना होगा। इस कार्य की जांच के लिए बाकायदा टीमें गठित की गई हैं जो हर छह माह के अंतराल में कंपनी की ओर से किए गए कार्य का आकलन करेंगी। यदि निर्धारित समय में कार्य पूरा नहीं हो पाता है तो इसके लिए एनएचएआई प्रबंधन कंपनी पर जुर्माना लगा सकता है। जिस डंपिंग साइट को कंपनी ने निजी तौर पर लिया था वो पूरी तरह से भर गई है और मलबा सड़क तक पहुंच रहा है। इससे शिमला-चंडीगढ़ मार्ग पर कई बार यातायात भी बाधित हुआ है। फिलहाल डंपिंग साइट का मसला कंपनी व एनएचएआई प्रबंधन के गले की फांस बन गया है और इस पूरे प्रकरण में वन विभाग की अनुमति इस पूरे प्रकरण की जड़ हैै। कंपनी ने पहाड़ को कई जगह से खोदना शुरू कर दिया था। लेकिन अब यहां काम को रोकना पड़ रहा है। लगातार बारिश की वजह से पहाड़ पर लटक रहा मलबा भी कालका-शिमला मार्ग पर दौड़ रहे वाहनों के लिए नया खतरा बना हुआ है।
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वन मंडल अधिकारी सोलन आरएस जसवाल का कहना है कि कंपनी या एनएचएआई की तरफ से कोई भी प्रस्ताव विभाग के पास नहीं आया है। यदि कंपनी को वन विभाग की जमीन पर मलबा फेंकना है तो इसके लिए स्वीकृति लेनी होगी। प्रस्ताव आने के बाद करीब एक माह में विभाग की ओर से स्वीकृति पत्र कंपनी को प्रदान किए जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि बिना स्वीकृति कंपनी को वन विभाग की जमीन पर मलबा फेंकने की इजाजत नहीं मिलेगी।
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एसडीएम कंडाघाट संजीव धीमान का कहना है कि कंपनी प्रबंधन की ढील की वजह से डंपिंग साइट चयनित नहीं हो पा रही है। कंपनी प्रबंधन साइट हासिल करने में तेजी दिखाए तो यह काम जल्द हो सकता है। उन्होंने बताया कि कंपनी बिना अनुमति के राजस्व विभाग की जमीन पर मलबा फेंकती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। कंपनी को इस हरकत के लिए जुर्माना भुगतना पड़ेगा।
कंपनी के साइट प्रबंधक अमित मलिक का कहना है कि प्रशासन, एनएचएआई प्रबंधन व वन विभाग के संपर्क में हैं और मंजूरी के लिए प्रस्ताव भी दे रखा है। इसके बावजूद उन्हें अनुमति नहीं मिल पाई है। इसकी वजह से काम में देरी हो रही है। उन्होंने बताया कि यही चलता रहा तो कंपनी तय समय में निर्माण पूरा नहीं कर पाएगी और ऐसा होता है तो उसके लिए अकेले निर्माता कंपनी को दोषी नहीं माना जाना चाहिए।