{"_id":"5a58e5974f1c1bb23f8b470e","slug":"31515775383-solan-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"लोहड़ी पर अब सुनाई नहीं देते सुंदर मुंदरिये के बोल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लोहड़ी पर अब सुनाई नहीं देते सुंदर मुंदरिये के बोल
Updated Fri, 12 Jan 2018 10:29 PM IST
विज्ञापन
lohri
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सोलन/बद्दी। लोहड़ी पर्व पर अब बहुत कम सुंदर मुंदरिये के बोल सुनाई पड़ते है। कभी लोग एक जगह पर एकत्रित होकर हर घर से लकड़ी लेकर लोहड़ी जलाकर पर्व मनाते थे। सुंदर मुंदरिये गीत गाकर खुशी खुशी इस पर्व को मनाते थे लेकिन आधुनिक युग, इंटरनेट और पाश्चात्य संस्कृति पर्वों पर भारी पड़ गई है। सोशल मीडिया में आई क्रांति से युवा अब इसमें अधिक मशगूल हो गए हैं। लोग प्राचीन संस्कृति को भुलाते जा रहे हैं।
अब बधाईयों का दौर भी सोशल साइट तक सिमटकर रह गया है। बीबीएन में एक समय ऐसा भी था जब नववर्ष के आगाज से ही लोहड़ी पर्व की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। आधुनिक दौर में यह सब अब सपना बनकर रह गया है। लोहड़ी पर्व पर जहां सुंदर मुंदरिए के बोल सुनाई नहीं देते वहीं लोहड़ी मांगते हुए बच्चों की पुकारें भी आधुनिकता की चकाचौंध में गुम नजर आती हैं। करीब 300 सालों से मनाए जाने वाले ऐतिहासिक पीरस्थान लोहड़ी मेले की आस्था आज भी बरकरार है लेकिन लोहड़ी पर्व पर वैसी चकाचौंध अब नजर नहीं आती है।
एक स्थान पर एकत्रित होकर मनाते थे लोहड़ी
आज से कुछ सालों पहले लोहड़ी पर्व का अपना ही महत्व था। इसकी तैयारियों को लेकर लोगों सहित बच्चों में भी खासा उत्साह होता था। लोहड़ी पर्व पर जलाए जाने वाले अलावा के लिए जहां प्रत्येक घर से एक-एक लकड़ी एकत्रित की जाती थी, वहीं गोबर के उपले भी जलाने के लिए इकट्ठे किए जाते थे। इन सभी की पूजा अर्चना की जाती थी और समस्त घरों के लोग एक स्थान पर एकत्रित होते थे। एकत्रित की गई लकड़ियों और गोबर के उपले जलाए जाते थे और महिलाएं सुंदर मुंदरिए का गीत गाती थीं।
विज्ञापन
सभ्यता को कायम रखना जरूरी : डंडोरा
वरिष्ठ नागरिक एवं समाजसेवी सुरजीत डंडोरा के मुताबिक पहले सभी घरों के लोग एकत्रित होकर लोहड़ी का पर्व मनाते थे। इसके लिए बाकायदा प्रत्येक घर से लकड़ी और गोबरे के उपले एकत्रित किए जाते थे जिनकी पूजा अर्चना के बाद महिलाएं सुंदर मुंदरिए का गीत गातीं थीं। लेकिन आज के दौर में यह प्रचलन धीरे-धीरे कम होने लगा है। उन्होंने कहा कि पुरानी परंपराओं के मुकाबले आज की आधुनिक परंपराएं कुछ भी नहीं है। लोगों को अपनी सभ्यता को नहीं भूलना चाहिए और अपनी संस्कृति को कायम रखना चाहिए। इतिहास बढ़ाना है तो प्राचीन परंपराओं को बढ़ाना होगा।
विज्ञापन
अब बधाईयों का दौर भी सोशल साइट तक सिमटकर रह गया है। बीबीएन में एक समय ऐसा भी था जब नववर्ष के आगाज से ही लोहड़ी पर्व की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। आधुनिक दौर में यह सब अब सपना बनकर रह गया है। लोहड़ी पर्व पर जहां सुंदर मुंदरिए के बोल सुनाई नहीं देते वहीं लोहड़ी मांगते हुए बच्चों की पुकारें भी आधुनिकता की चकाचौंध में गुम नजर आती हैं। करीब 300 सालों से मनाए जाने वाले ऐतिहासिक पीरस्थान लोहड़ी मेले की आस्था आज भी बरकरार है लेकिन लोहड़ी पर्व पर वैसी चकाचौंध अब नजर नहीं आती है।
विज्ञापन
एक स्थान पर एकत्रित होकर मनाते थे लोहड़ी
आज से कुछ सालों पहले लोहड़ी पर्व का अपना ही महत्व था। इसकी तैयारियों को लेकर लोगों सहित बच्चों में भी खासा उत्साह होता था। लोहड़ी पर्व पर जलाए जाने वाले अलावा के लिए जहां प्रत्येक घर से एक-एक लकड़ी एकत्रित की जाती थी, वहीं गोबर के उपले भी जलाने के लिए इकट्ठे किए जाते थे। इन सभी की पूजा अर्चना की जाती थी और समस्त घरों के लोग एक स्थान पर एकत्रित होते थे। एकत्रित की गई लकड़ियों और गोबर के उपले जलाए जाते थे और महिलाएं सुंदर मुंदरिए का गीत गाती थीं।
विज्ञापन
सभ्यता को कायम रखना जरूरी : डंडोरा
वरिष्ठ नागरिक एवं समाजसेवी सुरजीत डंडोरा के मुताबिक पहले सभी घरों के लोग एकत्रित होकर लोहड़ी का पर्व मनाते थे। इसके लिए बाकायदा प्रत्येक घर से लकड़ी और गोबरे के उपले एकत्रित किए जाते थे जिनकी पूजा अर्चना के बाद महिलाएं सुंदर मुंदरिए का गीत गातीं थीं। लेकिन आज के दौर में यह प्रचलन धीरे-धीरे कम होने लगा है। उन्होंने कहा कि पुरानी परंपराओं के मुकाबले आज की आधुनिक परंपराएं कुछ भी नहीं है। लोगों को अपनी सभ्यता को नहीं भूलना चाहिए और अपनी संस्कृति को कायम रखना चाहिए। इतिहास बढ़ाना है तो प्राचीन परंपराओं को बढ़ाना होगा।