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ददाहू में आवारा कुतों के आतंक से दहशत
Updated Sun, 21 Jan 2018 11:04 PM IST
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कुत्ते के मरने पर मेयर ने जताई रेबीज की आशंका
- फोटो : अमर उजाला
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अमर उजाला ब्यूरो
ददाहू (सिरमौर)।
पांवटा के अमरकोट में कुत्तों के हमले से हुई बच्चे की दर्दनाक मौत के समाचार से ददाहू के अभिभावक दहशत में हैं। ददाहू में भी बंदरों और कुत्तों का आतंक अपने चरम पर है जिसकी वजह से अभिभावक चिंतित हो उठे हैं। इन दिनों ददाहू क्षेत्र के बाजार व गलियों में भी कुत्तों का खौफ मंडरा रहा है। खौफ इतना है कि यहां बच्चों को स्कूल ले जाने व लाने के लिए अभिभावक घबराने लगे हैं।
ददाहू में आधा दर्जन के करीब सरकारी व निजी स्कूलों के माध्यम से सैकड़ों बच्चों की सुरक्षा केवल बंदरों व कुत्तों की वजह से दांव पर है। कुत्तों के पिल्ले हर आने जाने वाले के आसपास मंडराते देखे जा सकते हैं लेकिन आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या व धरपकड़ के लिए पंचायतों के पास कोई संसाधन और योजना नहीं है जिससे कि कुत्तों व बंदरों के बढ़ते आतंक से बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को बचाया जा सके।
एक माह के दौरान 8 से 10 मामले कुत्तों के काटने के पेश आ रहे हैं जिनको बाकायदा रेबीज के टीके लगाकर बचाया जा रहा है। हालांकि, ददाहू में कुत्ते पालने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। आवारा कुत्तों की संख्या सैकड़ों में हैं जो सड़क, बाजार व गलियों में घूमकर वाहन चालकों के साथ-साथ राहगीरों के लिए भी आफत बने हुए हैं। सर्वाधिक परेशानी तो स्कूल आने जाने वाले बच्चों को झेलनी पड़ रही है लेकिन पंचायतों के पास शक्तियां होने के बावजूद भी इस बारे में वह कोई सख्त कदम नहीं उठा रही है।
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उधर, पशुपालन विभाग की सहायक निदेशक डॉ. नीरू शबनम ने कहा कि पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत ऐसी बहुत सी योजनाएं हैं जिसमें नर व मादा कुत्तों की नसबंदी के लिए विशेष प्रावधान है। विभाग इस कार्य को अपने स्तर पर कर भी रहा है लेकिन इस कार्यक्रम को पंचायतों व स्वयं सेवी संस्थाओं के सहयोग के बिना नहीं चलाया जा सकता क्योंकि कुत्तों का पकड़ कर लाना इन संस्थाओं का दायित्व है।
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ददाहू (सिरमौर)।
पांवटा के अमरकोट में कुत्तों के हमले से हुई बच्चे की दर्दनाक मौत के समाचार से ददाहू के अभिभावक दहशत में हैं। ददाहू में भी बंदरों और कुत्तों का आतंक अपने चरम पर है जिसकी वजह से अभिभावक चिंतित हो उठे हैं। इन दिनों ददाहू क्षेत्र के बाजार व गलियों में भी कुत्तों का खौफ मंडरा रहा है। खौफ इतना है कि यहां बच्चों को स्कूल ले जाने व लाने के लिए अभिभावक घबराने लगे हैं।
ददाहू में आधा दर्जन के करीब सरकारी व निजी स्कूलों के माध्यम से सैकड़ों बच्चों की सुरक्षा केवल बंदरों व कुत्तों की वजह से दांव पर है। कुत्तों के पिल्ले हर आने जाने वाले के आसपास मंडराते देखे जा सकते हैं लेकिन आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या व धरपकड़ के लिए पंचायतों के पास कोई संसाधन और योजना नहीं है जिससे कि कुत्तों व बंदरों के बढ़ते आतंक से बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को बचाया जा सके।
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एक माह के दौरान 8 से 10 मामले कुत्तों के काटने के पेश आ रहे हैं जिनको बाकायदा रेबीज के टीके लगाकर बचाया जा रहा है। हालांकि, ददाहू में कुत्ते पालने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। आवारा कुत्तों की संख्या सैकड़ों में हैं जो सड़क, बाजार व गलियों में घूमकर वाहन चालकों के साथ-साथ राहगीरों के लिए भी आफत बने हुए हैं। सर्वाधिक परेशानी तो स्कूल आने जाने वाले बच्चों को झेलनी पड़ रही है लेकिन पंचायतों के पास शक्तियां होने के बावजूद भी इस बारे में वह कोई सख्त कदम नहीं उठा रही है।
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उधर, पशुपालन विभाग की सहायक निदेशक डॉ. नीरू शबनम ने कहा कि पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत ऐसी बहुत सी योजनाएं हैं जिसमें नर व मादा कुत्तों की नसबंदी के लिए विशेष प्रावधान है। विभाग इस कार्य को अपने स्तर पर कर भी रहा है लेकिन इस कार्यक्रम को पंचायतों व स्वयं सेवी संस्थाओं के सहयोग के बिना नहीं चलाया जा सकता क्योंकि कुत्तों का पकड़ कर लाना इन संस्थाओं का दायित्व है।