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Rampur Bushahar News: सांगला के देबार कंडे में खतरे की घंटी बनी यारपाबंग झील
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सांगला के देबार कंडे की यारपाबंग झील में सुरक्षा कार्यों को जल्द पूरा करने की उठी मांग। संवाद
. 550 मीटर लंबी, 260 मीटर चौड़ी झील भूकंप और बाढ़ की स्थिति में पहुंचा सकती है भारी नुकसान
. दो वर्ष पूर्व संयुक्त दल ने किया था निरीक्षण, अब तक सुरक्षा के नहीं हुई इंतजाम
. बाढ़ की स्थिति बनने पर बास्पा और सतलुज नदी किनारे पहुंच सकती है भारी क्षति
. वैली के लोगों ने सरकार और जिला प्रशासन से सुरक्षा कार्य जल्द पूरा करने की लगाई गुहार
संवाद न्यूज एजेंसी
सांगला(किन्नौर)। नेपाल में आई भयंकर बाढ़ के बाद से सांगला घाटी के लोगों में डर का माहौल है। इसका कारण सांगला के देबार कंडे में बढ़ता जा रहा यारपाबंग झील का क्षेत्रफल है। यहां करीब 550 मीटर लंबी और 260 मीटर चौड़ी झील भूकंप और बाढ़ की स्थिति में बास्पा और सतलुज नदी के मुहाने पर बसे इलाकों में भारी तबाही मचा सकती है। सांगला घाटी के लोगों ने प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन से यहां सुरक्षा के लिहाज से उचित कार्य करने की मांग की है। वर्ष 2024 में संयुक्त दल ने झील का निरीक्षण किया था, लेकिन तब से लेकर अब तक यहां सुरक्षा के लिहाज से कोई कार्य नहीं हो पाया है, जिससे क्षेत्र के लोगों की चिंता बढ़ी हुई है। नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा के बाद से सांगला वासी भी खासे सहमे हुए हैं। सांगला के देबार कंडे में बनी यारपाबंग झील का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है, जबकि यहां सुरक्षा के लिहाज से कोई कार्य नहीं हो पाया है। यदि भूकंप आने या ग्लेशियर पिघलने से झील टूटती है तो बाढ़ से बास्पा और सतलुज नदी में काफी तबाही मचेगी। सांगला घाटी के हुरभा, केदारचो, छिदोसारिंग, चांगसारिंग, रूतरंग, जारयो सारिंग, शौंग गांव, निचले क्षेत्रों और ब्रुआ यानी सांगला से कड़छम तक करीब 18 किलोमीटर क्षेत्र में काफी नुकसान हो सकता है। इतना ही नहीं, बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होने से सांगला के कुपा में बनी 300 मेगावाट बास्पा-2 परियोजना, एक हजार मेगावाट कड़छम-वांगतू और एक हजार मेगावाट की बास्पा-2 परियोजना को भी नुकसान पहुंच सकता है। इस प्राकृतिक झील से बचाव को लेकर पूर्व के वर्षों से मांग उठती आ रही है। वर्ष 2024 में इस झील की वास्तविक स्थिति जानने के लिए सीटीओसी, सीआईएनसी, भारतीय सेना, आईटीबीपी, जिला प्रशासन, पुलिस, होमगार्ड और स्थानीय लोगों का दल निरीक्षण करने गया था। दल ने पाया था कि यहां करीब 550 मीटर लंबी, 260 मीटर चौड़ी और 28 मीटर गहरी झील बनी है। टीम ने पानी और ग्लेशियर टेस्टिंग के सैंपल एकत्र किए थे, लेकिन दो वर्ष बाद भी इस झील में सुरक्षा के लिहाज से कोई कार्य नहीं हो पाया है। इससे स्थानीय लोगों में खासी निराशा है।
हाल ही में सांगला के पर्यावरण संरक्षक पदमहंस रेपाल्टो ने झील का निरीक्षण किया और वर्तमान स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि झील के किनारे बना ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है। उन्होंने प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन से यहां सुरक्षा के लिहाज से उचित कार्य करने की मांग उठाई है।
प्रधान सांगला प्रविंद्र सिंह नेगी ने प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन से मांग की है कि समय रहते झील का निरीक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए। सुरक्षा के लिहाज से प्रशासन को यहां अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाना चाहिए, ताकि आपदा की स्थिति में लोग सतर्क हो पाएं और नुकसान से बचा जा सके।
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जिला उपायुक्त किन्नौर डॉ. अमित कुमार शर्मा ने बताया कि सांगला कंडे में बनी झील की सुरक्षा के उपायों के लिए जिला प्रशासन ने संबंधित रिपोर्ट तैयार कर राज्य सरकार को भेजी है। यहां सुरक्षा कार्यों के लिए करीब एक करोड़ रुपये की स्वीकृति मिल चुकी है। जल्द ही सुरक्षा कार्यों को अमलीजामा पहनाया जाएगा।
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. दो वर्ष पूर्व संयुक्त दल ने किया था निरीक्षण, अब तक सुरक्षा के नहीं हुई इंतजाम
. बाढ़ की स्थिति बनने पर बास्पा और सतलुज नदी किनारे पहुंच सकती है भारी क्षति
. वैली के लोगों ने सरकार और जिला प्रशासन से सुरक्षा कार्य जल्द पूरा करने की लगाई गुहार
संवाद न्यूज एजेंसी
सांगला(किन्नौर)। नेपाल में आई भयंकर बाढ़ के बाद से सांगला घाटी के लोगों में डर का माहौल है। इसका कारण सांगला के देबार कंडे में बढ़ता जा रहा यारपाबंग झील का क्षेत्रफल है। यहां करीब 550 मीटर लंबी और 260 मीटर चौड़ी झील भूकंप और बाढ़ की स्थिति में बास्पा और सतलुज नदी के मुहाने पर बसे इलाकों में भारी तबाही मचा सकती है। सांगला घाटी के लोगों ने प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन से यहां सुरक्षा के लिहाज से उचित कार्य करने की मांग की है। वर्ष 2024 में संयुक्त दल ने झील का निरीक्षण किया था, लेकिन तब से लेकर अब तक यहां सुरक्षा के लिहाज से कोई कार्य नहीं हो पाया है, जिससे क्षेत्र के लोगों की चिंता बढ़ी हुई है। नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा के बाद से सांगला वासी भी खासे सहमे हुए हैं। सांगला के देबार कंडे में बनी यारपाबंग झील का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है, जबकि यहां सुरक्षा के लिहाज से कोई कार्य नहीं हो पाया है। यदि भूकंप आने या ग्लेशियर पिघलने से झील टूटती है तो बाढ़ से बास्पा और सतलुज नदी में काफी तबाही मचेगी। सांगला घाटी के हुरभा, केदारचो, छिदोसारिंग, चांगसारिंग, रूतरंग, जारयो सारिंग, शौंग गांव, निचले क्षेत्रों और ब्रुआ यानी सांगला से कड़छम तक करीब 18 किलोमीटर क्षेत्र में काफी नुकसान हो सकता है। इतना ही नहीं, बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होने से सांगला के कुपा में बनी 300 मेगावाट बास्पा-2 परियोजना, एक हजार मेगावाट कड़छम-वांगतू और एक हजार मेगावाट की बास्पा-2 परियोजना को भी नुकसान पहुंच सकता है। इस प्राकृतिक झील से बचाव को लेकर पूर्व के वर्षों से मांग उठती आ रही है। वर्ष 2024 में इस झील की वास्तविक स्थिति जानने के लिए सीटीओसी, सीआईएनसी, भारतीय सेना, आईटीबीपी, जिला प्रशासन, पुलिस, होमगार्ड और स्थानीय लोगों का दल निरीक्षण करने गया था। दल ने पाया था कि यहां करीब 550 मीटर लंबी, 260 मीटर चौड़ी और 28 मीटर गहरी झील बनी है। टीम ने पानी और ग्लेशियर टेस्टिंग के सैंपल एकत्र किए थे, लेकिन दो वर्ष बाद भी इस झील में सुरक्षा के लिहाज से कोई कार्य नहीं हो पाया है। इससे स्थानीय लोगों में खासी निराशा है।
हाल ही में सांगला के पर्यावरण संरक्षक पदमहंस रेपाल्टो ने झील का निरीक्षण किया और वर्तमान स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि झील के किनारे बना ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है। उन्होंने प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन से यहां सुरक्षा के लिहाज से उचित कार्य करने की मांग उठाई है।
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प्रधान सांगला प्रविंद्र सिंह नेगी ने प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन से मांग की है कि समय रहते झील का निरीक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए। सुरक्षा के लिहाज से प्रशासन को यहां अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाना चाहिए, ताकि आपदा की स्थिति में लोग सतर्क हो पाएं और नुकसान से बचा जा सके।
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जिला उपायुक्त किन्नौर डॉ. अमित कुमार शर्मा ने बताया कि सांगला कंडे में बनी झील की सुरक्षा के उपायों के लिए जिला प्रशासन ने संबंधित रिपोर्ट तैयार कर राज्य सरकार को भेजी है। यहां सुरक्षा कार्यों के लिए करीब एक करोड़ रुपये की स्वीकृति मिल चुकी है। जल्द ही सुरक्षा कार्यों को अमलीजामा पहनाया जाएगा।