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Rampur Bushahar News: बाहलीधार में कल सजेगा टरू नारायण का पारंपरिक मेला
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. देवता दमुख के सानिध्य में ढोल-नगाड़ों की थाप पर चलेगा नाटियों का दौर
. सदियों पुरानी फुआलों के स्वागत की परंपरा होगी जीवंत
संवाद न्यूज एजेंसी
डंसा (रामपुर बुशहर)। नोगवैली में आठ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बाहलीधार के ऐतिहासिक टरू नारायण मंदिर में बुधवार को देवता साहिब दमुख के सानिध्य में एक दिवसीय पारंपरिक मेले का आयोजन किया जा रहा है। इस मेले में क्षेत्र के सैकड़ों लोग देवता का आशीर्वाद लेने पहुंचेंगे। टरू नारायण मंदिर में आयोजित होने वाला यह मेला सदियों पुरानी परंपरा से जुड़ा है। प्राचीन समय में क्षेत्र के गांवों से भेड़-बकरियों को लेकर कंडे जाने वाले फुआलों की वापसी पर उनके स्वागत के लिए मेले का आयोजन किया जाता था। ग्रामीण फुआलों की खातिरदारी करते थे। देवता के सानिध्य में पारंपरिक नाटियों के साथ फुआलों के लौटने का जश्न मनाते थे। हालांकि, बदलते समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप भी बदल रहा है। भेड़-बकरियों की संख्या सीमित होने और लोगों की रोजमर्रा के कामकाज में बढ़ती व्यस्तता के कारण मेले का पुराना स्वरूप अब धीरे-धीरे सिमट रहा है। पहले दर्जनों गड़रिये फुआलों के साथ मेले में पहुंचते थे, जबकि अब इक्का-दुक्का फुआल ही मेले में पहुंचकर महिला-पुरुषों के साथ नाटी डालते हैं। परशुराम मंदिर समिति के प्रधान खेल चंद नेगी, महासचिव जीएल डमालू, उपप्रधान गौरी दत्त नेगी, कोषाध्यक्ष दुर्गा दत्त शर्मा और कार्यालय सचिव ज्ञान हुडन ने बताया कि मंगलवार शाम देवता दमुख टरू नारायण मंदिर में शीश नवाने के बाद सनेई गांव में प्रवास करेंगे। बुधवार सुबह देवता देवलुओं के साथ बाहलीधार मेला स्थल के लिए प्रस्थान करेंगे। मेले में दिनभर नाटियों का दौर चलेगा। शाम को मेला संपन्न होने के बाद देवता दमुख अपने देवालय लौटेंगे।
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. सदियों पुरानी फुआलों के स्वागत की परंपरा होगी जीवंत
संवाद न्यूज एजेंसी
डंसा (रामपुर बुशहर)। नोगवैली में आठ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बाहलीधार के ऐतिहासिक टरू नारायण मंदिर में बुधवार को देवता साहिब दमुख के सानिध्य में एक दिवसीय पारंपरिक मेले का आयोजन किया जा रहा है। इस मेले में क्षेत्र के सैकड़ों लोग देवता का आशीर्वाद लेने पहुंचेंगे। टरू नारायण मंदिर में आयोजित होने वाला यह मेला सदियों पुरानी परंपरा से जुड़ा है। प्राचीन समय में क्षेत्र के गांवों से भेड़-बकरियों को लेकर कंडे जाने वाले फुआलों की वापसी पर उनके स्वागत के लिए मेले का आयोजन किया जाता था। ग्रामीण फुआलों की खातिरदारी करते थे। देवता के सानिध्य में पारंपरिक नाटियों के साथ फुआलों के लौटने का जश्न मनाते थे। हालांकि, बदलते समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप भी बदल रहा है। भेड़-बकरियों की संख्या सीमित होने और लोगों की रोजमर्रा के कामकाज में बढ़ती व्यस्तता के कारण मेले का पुराना स्वरूप अब धीरे-धीरे सिमट रहा है। पहले दर्जनों गड़रिये फुआलों के साथ मेले में पहुंचते थे, जबकि अब इक्का-दुक्का फुआल ही मेले में पहुंचकर महिला-पुरुषों के साथ नाटी डालते हैं। परशुराम मंदिर समिति के प्रधान खेल चंद नेगी, महासचिव जीएल डमालू, उपप्रधान गौरी दत्त नेगी, कोषाध्यक्ष दुर्गा दत्त शर्मा और कार्यालय सचिव ज्ञान हुडन ने बताया कि मंगलवार शाम देवता दमुख टरू नारायण मंदिर में शीश नवाने के बाद सनेई गांव में प्रवास करेंगे। बुधवार सुबह देवता देवलुओं के साथ बाहलीधार मेला स्थल के लिए प्रस्थान करेंगे। मेले में दिनभर नाटियों का दौर चलेगा। शाम को मेला संपन्न होने के बाद देवता दमुख अपने देवालय लौटेंगे।