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Rampur Bushahar News: रोहड़ू में पारंपरिक परिधानों से सजा पालु री जातरे मेला संपन्न
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रोहल मे मेले के समापन पर उमड़े श्रद्धालु। संवाद
मेले में क्षेत्र की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाजों की अनूठी झलक देखने को मिली
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू।
रोहल पंचायत में देवता महाराज पवासी का पारंपरिक भादो मेला पालु री जातरे बुधवार को संपन्न हो गया। इस बार मेले की सबसे खास पहचान पारंपरिक परिधानों में नजर आई। मेले में क्षेत्र की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाजों की अनूठी झलक देखने को मिली। मंदिर कमेटी रोहल ने ग्रामीणों से सांस्कृतिक विरासत और रीति-रिवाजों के संरक्षण के लिए पारंपरिक वेशभूषा में मेले में पहुंचने का आग्रह किया था। इसका व्यापक असर देखने को मिला। मंजवाड़ी, जतवानी, गंईचवाड़ी थाना और चिचवाड़ी गांव की सैकड़ों महिलाएं पारंपरिक जुड़की पहनकर मेले में पहुंचीं। रंगबिरंगे पारंपरिक परिधानों से सजा मेला स्थल क्षेत्र की लोक संस्कृति का जीवंत परिचय दे रहा था। मेले की शुरुआत भेड़ पालकों की पारंपरिक रस्मों से हुई। भेड़पालकों ने कुल देवता को पवित्र फूल मालाएं अर्पित कीं। ये फूल करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों से विशेष परंपराओं और व्रत का पालन करते हुए लाए जाते हैं। इनमें ब्रह्मकमल, नेसर और सुपाली जैसे दुर्लभ फूल शामिल रहे। स्थानीय देवता विष्णु नारायण की उपस्थिति में श्रद्धालुओं ने देव परंपराओं का निर्वहन किया। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनों पर ग्रामीणों ने जमकर नृत्य किया। मेले में बुजुर्गों से लेकर युवाओं और महिलाओं तक सभी ने पारंपरिक संस्कृति को सहेजने में अपनी भागीदारी निभाई। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन, लोकनृत्य और पारंपरिक परिधानों ने मेले की रौनक बढ़ा दी। ग्रामीणों ने देव आस्था के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश दिया। यह आयोजन क्षेत्र की पहचान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देवता के मोतमीन कैलाश मेहता ने कहा कि पालु री जातरे केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। यह क्षेत्र की सदियों पुरानी लोक संस्कृति, देव परंपराओं और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है। मेले के समापन पर ग्रामीणों ने देवता महाराज पवासी से क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की। यह मेला आस्था और सामुदायिक भावना का संगम है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू।
रोहल पंचायत में देवता महाराज पवासी का पारंपरिक भादो मेला पालु री जातरे बुधवार को संपन्न हो गया। इस बार मेले की सबसे खास पहचान पारंपरिक परिधानों में नजर आई। मेले में क्षेत्र की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाजों की अनूठी झलक देखने को मिली। मंदिर कमेटी रोहल ने ग्रामीणों से सांस्कृतिक विरासत और रीति-रिवाजों के संरक्षण के लिए पारंपरिक वेशभूषा में मेले में पहुंचने का आग्रह किया था। इसका व्यापक असर देखने को मिला। मंजवाड़ी, जतवानी, गंईचवाड़ी थाना और चिचवाड़ी गांव की सैकड़ों महिलाएं पारंपरिक जुड़की पहनकर मेले में पहुंचीं। रंगबिरंगे पारंपरिक परिधानों से सजा मेला स्थल क्षेत्र की लोक संस्कृति का जीवंत परिचय दे रहा था। मेले की शुरुआत भेड़ पालकों की पारंपरिक रस्मों से हुई। भेड़पालकों ने कुल देवता को पवित्र फूल मालाएं अर्पित कीं। ये फूल करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों से विशेष परंपराओं और व्रत का पालन करते हुए लाए जाते हैं। इनमें ब्रह्मकमल, नेसर और सुपाली जैसे दुर्लभ फूल शामिल रहे। स्थानीय देवता विष्णु नारायण की उपस्थिति में श्रद्धालुओं ने देव परंपराओं का निर्वहन किया। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनों पर ग्रामीणों ने जमकर नृत्य किया। मेले में बुजुर्गों से लेकर युवाओं और महिलाओं तक सभी ने पारंपरिक संस्कृति को सहेजने में अपनी भागीदारी निभाई। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन, लोकनृत्य और पारंपरिक परिधानों ने मेले की रौनक बढ़ा दी। ग्रामीणों ने देव आस्था के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश दिया। यह आयोजन क्षेत्र की पहचान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देवता के मोतमीन कैलाश मेहता ने कहा कि पालु री जातरे केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। यह क्षेत्र की सदियों पुरानी लोक संस्कृति, देव परंपराओं और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है। मेले के समापन पर ग्रामीणों ने देवता महाराज पवासी से क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की। यह मेला आस्था और सामुदायिक भावना का संगम है।